उद्धरण ::
महात्मा गांधी

शरीर का सुख कैसे मिले, यही आज की सभ्यता ढूँढती है, और वो यही देने की कोशिश करती है। यह भी नहीं मिल पाता।

सत्याग्रह सर्वोपरि बल है।

मुझे प्रधानमंत्रियों से द्वेष नहीं है, लेकिन तजुर्बे से मैंने देखा है कि वे सच्चे देशाभिमानी नहीं कहे जा सकते। जिसे हम घूस कहते हैं, वह घूस वे खुल्लमखुल्ला नहीं लेते-देते, इसीलिए भले ही वे ईमानदार कहे जाएँ, लेकिन उनके पास वसीला काम कर सकता है। वे दूसरों से काम निकालने के लिए उपाधि वग़ैरा की घूस बहुत देते हैं।

साधु में यदि आध्यात्मिक निधि नहीं है, तो वह मानवता पर कलंक है।

क्या आप मानते हैं कि अंग्रेज़ी अदालतें यहाँ न होतीं तो वे हमारे देश में राज कर सकते थे? ये अदालतें लोगों के भले के लिए नहीं हैं। जिन्हें अपनी सत्ता क़ायम रखनी है, वे अदालतों के ज़रिए लोगों को बस में रखते हैं।

सत्याग्रह या आत्मबल को अंग्रेज़ी में ‘पैसिव रेजिसटेंस’ कहा जाता है। जिन लोगों ने अपने अधिकार पाने के लिए खुद दुःख सहन किया था, उनके दुःख सहने के ढंग के लिए यह शब्द बरता गया है।

सत्याग्रह के लिए जो हिम्मत और बहादुरी चाहिए, वह तोप का बल रखने वाले के पास हो ही नहीं सकती।

नामर्द आदमी घड़ी भर के लिए भी सत्याग्रही नहीं रह सकता।

मेरे मन में तो हिंदुस्तान का अर्थ वे करोड़ों किसान हैं, जिनके सहारे राजा और हम सब जी रहे हैं।

सत्य का सबसे बड़ा प्रमाण तो यही है कि दुनिया लड़ाई के हंगामे के बावजूद टिकी हुई है। इसीलिए लड़ाई के बल के बजाय दूसरा ही बल उसका आधार है।

भारत में यदि कोई ग्रंथ झोपड़ियों से महलों तक में स्थान पा सका है, तो वह तुलसीकृत रामायण है। भारतीय संस्कृति को अगर एक शब्द में वर्णित करना हो तो वह शब्द है राम।

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यहाँ प्रस्तुत उद्धरण महात्मा गांधी की किताब ‘हिन्द स्वराज’ से साभार लिए गए हैं।

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