संस्मरण : संजय कुन्दन

मुक्तिबोध की कविताओं से पहली बार सामना होने पर झटका लगा, बिल्कुल बिजली के करंट जैसा. उन दिनों मैंने मैट्रिक (दसवीं) की परीक्षा पास की थी और इंटर में मेरा दाखिला पटना कॉलेज में हुआ था. तब इंटर की पढ़ाई कॉलेज में होती थी. तब मेरी बड़ी बहन बीए में हिंदी साहित्य पढ़ रही थी. मुक्तिबोध उसके कोर्स में थे. मैं उसकी सारी किताबें पढ़ता था, सो मुक्तिबोध को भी पढ़ा. आश्चर्य हुआ कि क्या हिंदी ऐसी भी होती है और क्या कविता इस तरह भी लिखी जाती है. उस समय तक मेरे लेखन और रंगकर्म की शुरुआत हो चुकी थी. साहित्य में खासी दिलचस्पी ले रहा था पर मुक्तिबोध से सामना नहीं हुआ था. लेकिन उनकी कविता में मैंने घुसना शुरू किया तो आसानी से घुस गया. इसका कारण यह था कि मुझे ‘अंधेरे में’ बिल्कुल नाटक लगी. नाटकों की तरह ही दृश्य पर दृश्य. संवाद और चरित्र भी. तो इस तरह नाटक की अपनी समझ ने मुझे अंधेरे में को पढ़ने का एक सूत्र दे दिया. मुझे पहली बार पता चला कि इस तरह नाटकीय शैली में भी आधुनिक कविताएं लिखी जा सकती हैं. दिनकर शैली के खंडकाव्यों से अलग. इस तरह मुझे कविता लिखने का भी एक सूत्र मिला. पहली बार पता चला कि भावों का भी मानवीकरण किया जा सकता है. जैसे भूल गलती भी जिरह-बख्तर पहनकर बैठ सकती है. जैसे भारतेंदु के नाटक ‘भारत दुर्दशा’ में डिसलायल्टी भी एक चरित्र है. पटना में इसके एक मंचन में एक लड़की पैंट-शर्ट पहनकर डिसलायलटी बनी थी. तो इस तरह मुक्तिबोध के जरिए मैंने कविता और नाटक के अंतर्संबंध को भी जाना.

‘चांद का मुंह टेढ़ा है’ पढ़ जाने के बाद मैं समझ गया कि हिंदी कविता की भाषा मुक्तिबोध के बाद एकदम बदल सी गई. हालांकि यह सच है कि चांद का मुंह टेढ़ा है की ज्यादातर कविताएं मेरी समझ में ही नहीं आईं. कई बार लगता था कि एक ही कविता बार-बार लिखी जा रही है. पर कवि की बेचैनी को महसूस कर सकता था. उन्हें पढ़ते हुए लगा कि अपने जीवन को, इस जीव-जगत को देखने का एक तरीका यह है कि उससे एकदम अलग एक संसार में जाकर उसे देखा जाए. मुक्तिबोध एक अलग ही परिवेश रचते हैं, एक जादुई परिवेश. लेकिन मुझे उसे लेकर कोई दुविधा नहीं थी. मैं अच्छी तरह समझ रहा था कि यह दरअसल हमारा ही जीवन है, जिसका यह रूप देखने के लिए मुक्तिबोध जैसी दृष्टि की जरूरत है. उन दिनों मैं रंगमंच के अलावा शहर की साहित्यिक सर्किल में भी उठने-बैठने लगा था. शहर के प्रमुख लेखक-प्राध्यापकों के बीच मुक्तिबोध को लेकर चर्चा होती रहती थी. उनकी बातचीत से भी मुझे मुक्तिबोध को समझने में मदद मिली. मुझे किसी ने बताया कि वह हर किसी से मिलते ही पूछते थे कि पार्टनर, तुम्हारी पॉलिटक्स क्या है. तब मुझे यह बात समझ में आई कि साहित्य लिखने या कोई भी गंभीर काम करने के पीछे एक पॉलिटिकल लाइन का होना जरूरी है. इस तरह मैंने मन ही मन अपनी एक राजनीतिक दिशा तय कर ली.

फिर मैंने मुक्तिबोध का गद्य पढ़ डाला. एक साहित्यिक की डायरी पढ़ी. उनका कहानी संग्रह पढ़ा. उनकी कहानियों ने भी मुझे कम नहीं चौंकाया. उनकी कविताओं के विपरीत उनका कहानियां मुझे कम नाटकीय लगीं. उनकी कहानियों में मुझे कोई खास उतार-चढ़ाव नहीं दिखा. एक खास लय है, जो धीरे-धीरे चलती होती है. वहां भी लगता है जैसे मद्धिम रोशनी में सब कुछ चल रहा है. कहानियों में घटना न के बराबर हैं. उनमें चीजें किसी परिणति पर पहुंचती हुई नहीं दिखतीं. सब कुछ अधूरा-अधूरा सा धुआं, धुआं सा  लगता है. इस तरह मेरे सामने साहित्य का एक नया अध्याय खुला. फिर मुक्तिबोध के जीवन के बारे में पता चला. उनके संघर्षपूर्ण जीवन को जाना.  मुझे लग गया कि यह शख्स जीनियस है. उनकी बीड़ी पीती हुई तस्वीर में मुझे एक रुमानियत दिखाई देती थी. मैंने उन्हें मन ही मन अपना हीरो मान लिया. हालांकि यह बात मैंने आज तक किसी को नहीं बताई.

मैं खुद पत्रकारिता के करियर के प्रति आकर्षित था, इसलिए  मुझे इस बात ने भी प्रभावित किया कि वे एक अखबार के संवाददाता के रूप में भी काम कर चुके हैं. उसके बाद जब भी मैं कविता लिखता उनकी भाषा मुझे परेशान करने लगती. मैं इस बात से डर जाता था कि मैं भी कहीं उसी भाषा में न लिखने लग जाऊं. खैर ऐसा नहीं हुआ. उसके बाद जब मैं खुद बीए में पहुंचा तो पाठ्यक्रम में मुक्तिबोध थे. मैं इस बात सो रोमांचित रहता था कि मुक्तिबोध को तो मैं पूरा पढ़ चुका हूं. उनके कई भाष्य पढ़ और सुन चुका हूं. तभी एक दिन मुक्तिबोध की कक्षा में पटना विश्वविद्यालय के एक जाने-माने प्राध्यापक ने अंधेरे में कविता की जो व्याख्या की ,वह सुनकर मैं आश्चर्य में पड़ गया. उन्होंने मृतक दल की शोभायात्रा को सर्वहारा वर्ग का जुलूस बता दिया. तब मुझे लगा कि मुक्तिबोध को सही अर्थों में समझने वाले लोग बेहद कम हैं. मेरे जी में आया कि मैं अध्यापक महोदय को उनकी गलती का अहसास कराऊं, लेकिन तब हमलोग अध्यापकों का बहुत सम्मान करते थे. मुझे लगा कि उनसे बेवजह उलझना ठीक नहीं होगा. मैं अपनी समझ पर कायम रहूंगा, वे चाहे कुछ भी बताएं. तब से मुक्तिबोध को पढ़ने और समझने का सिलसिला आज भी जारी है. हर बार उन्हें पढ़ने पर कुछ न कुछ नया खुलता है.

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[ संजय कुन्दन कवि-कथाकार हैं. इनसे sanjaykundan2@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है. आवरण के लिय कवि मुक्तिबोध की छवि गूगल से.]

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