जनता की तरह मौन है घिरनी

कविताएँ ::
गोलेन्द्र पटेल

गोलेन्द्र पटेल

जोंक

रोपनी जब करते हैं कर्षित किसान;
तब रक्त चूसते हैं जोंक!
चूहे फसल नहीं चरते
फसल चरते हैं
साँड और नीलगाय…

चूहे तो बस संग्रह करते हैं
गहरे गोदामीय बिल में!
टिड्डे पत्तियों के साथ
पुरुषार्थ को चाट जाते हैं

आपस में युद्ध कर
काले कौए मक्का बाजरा बांट खाते हैं!

प्यासी धूप
पसीना पीती है खेत में
जोंक की भाँति!

अंत में अक्सर ही
कर्ज के कच्चे खट्टे कायफल दिख जाते हैं
सिवान के हरे पेड़ पर लटके हुए!

इसे ही कभी कभी ढोता है एक किसान
सड़क से संसद तक की अपनी उड़ान में!

घिरनी

फोन पर शहर की काकी ने कहा है
कल से कल में पानी नहीं आ रहा है उनके यहाँ

अम्माँ! आँखों का पानी सूख गया है
भरकुंडी में है कीचड़
खाली बाल्टी रो रही है
जगत पर असहाय पड़ी डोरी क्या करे?

आह! जनता की तरह मौन है घिरनी
और तुम हँस रही हो।

श्रम का स्वाद

गाँव से शहर के गोदाम में गेहूँ?
गरीबों के पक्ष में बोलने वाला गेहूँ
एक दिन गोदाम से कहा
ऐसा क्यों होता है
कि अक्सर अकेले में अनाज
सम्पन्न से पूछता है
जो तुम खा रहे हो
क्या तुम्हें पता है
कि वह किस जमीन की उपज है
उसमें किसके श्रम का स्वाद है
इतनी ख़ुशबू कहाँ से आई?
तुम हो कि
ठूँसे जा रहे हो रोटी
निःशब्द!

गुढ़ी

लौनी गेहूँ का हो या धान का
बोझा बाँधने के लिए – गुढ़ी
बूढ़ी ही पुरवाती है पुवाल
बहू बाकी से ऐंठती है
और पीड़ा उसकी कलाई !

उम्मीद की उपज

उठो वत्स!
भोर से ही
जिंदगी का बोझ ढोना
किसान होने की पहली शर्त है
धान उगा
प्राण उगा
मुस्कान उगी
पहचान उगी
और उग रही
उम्मीद की किरण

सुबह सुबह
हमारे छोटे हो रहे
खेत से….!

मूर्तिकारिन

राजमंदिरों के महात्माओं
मौन मूर्तिकार की स्त्री हूँ

समय की छेनी-हथौड़ी से
स्वयं को गढ़ रही हूँ

चुप्पी तोड़ रही है चिंगारी!
सूरज को लगा है गरहन
लालटेनों का तेल खत्म हो गया है

चारों ओर अंधेरा है
कहर रहे हैं हर शहर

समुद्र की तूफानी हवा आ गई है गाँव
दीये बुझ रहे हैं तेजी से
मणि निगल रहे हैं साँप

और आम चीख चली –
दिल्ली!

पुदीना की पहचान

दुख की दुपहरिया में
मुर्झाया मोथा देख रहा है
मेंड़ की ओर
मकोय पककर गिर रही है
नीचे

(जैसे थककर गिर रहे हैं लोग
तपती सड़क पर…)

और
हाँ, यही सच है कि पानी बिन
ककड़ियों की कलियाँ सूख रही हैं
कोहड़ों का फूल झर रहा है

गाजर गा रही है गम के गीत
भिंड़ी भूल रही है
भंटा के भय से
मिर्च से सीखा हुआ मंत्र
मूली सुन रही है मिट्टी का गान

बाड़े में बोड़े की बात न पूछो
तेज़ हवा से टूटा डम्फल
ताड़ ने छेड़ा खड़खड़ाहट का तान

ध्यान से देख रही है दूब
झमड़े पर झूल रही हैं अनेक सब्जियाँ
(जैसे – कुनरू, करैला, नेनुआ, केदुआ, सतपुतिया, सेम , लौकी…)

पास में पालक-पथरी-चरी-चौराई चुप हैं
कोमल पत्तियों पर प्यासे बैठे पतंगें कह रहे हैं
इस कोरोना काल में
पुदीने की पहचान करना कितना कठिन हो गया है

आह! आज धनिया खोटते-खोटते
खोट लिया मैंने खुद का दुख!

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गोलेन्द्र पटेल खजूरगांव, चंदौली, उत्तरप्रदेश से आते हैं और बीएचयू में हिन्दी से स्नातक कर रहे हैं। उनसे corojivi@gmail.com  पर बात हो सकती है।

About the author

इन्द्रधनुष

जब समय और समाज इस तरह होते जाएँ, जैसे अभी हैं तो साहित्य ज़रूरी दवा है. इंद्रधनुष इस विस्तृत मरुस्थल में थोड़ी जगह हरी कर पाए, बचा पाए, नई बना पाए, इतनी ही आकांक्षा है.

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