कविताएँ ::
प्रभात

प्रभात

ऐसा क्या हो गया

ऐसा क्या था कि वह मुझे देखे बिना रह नहीं सकती थी
ऐसा क्या था कि मैं उसे देखे बिना रह नहीं सकता था

ऐसा क्या था कि वह मेरे ही बारे में सोचती रहती थी
ऐसा क्या था कि मैं उसके ही बारे में सोचता रहता था

ऐसा क्या था कि पूरे समय वही होती थी मेरे सपनों में
ऐसा क्या था कि पूरे समय मैं ही होता था उसके सपनों में

ऐसा क्या था कि गलियों में निकलता था यह सोचकर
काश वह किसी काम से निकली हो
और सच में वह किसी काम से निकली होती थी
और दिख जाती थी

ऐसा क्या हो गया मेरे देखने को, मेरे सोचने को, मेरे सपनों को
यह सोचकर गलियों में निकलने को
काश वह किसी काम से निकली हो
ऐसा क्या हो गया उसके देखने को, उसके सोचने को, उसके सपनों को
घर से किसी काम से निकलने को

सारस

तुम उस दिन पृथ्वी का नमक लेकर आई थी
और नींबू का रस
सारे गाँव ने हिकारत से देखा
और कइयों ने कहा
जानते हो कहाँ जा रहा है
ये नमक और रस
अपने तम्बाकू भरे मुखों से हँसे सब के सब
लेकिन घरों में चूल्हों के पास बैठी लड़कियों ने
माँओं से कहा- माँ समझाइये तो सही इसमें गलत है क्या
माँ चूल्हे में लकड़ी देते हुए पति के लिए रोटी सेकते हुए बोली
मुझे नहीं मालूम बेटी

फिर तुम्हें शादी कर गाँव से निकाल दिया गया
मैं भी फिर सदा के लिए गाँव से निकल गया

सारस ऐसे ही मर जाते हैं वनों में

जी लेंगे

क्या तुम्हारी लूगड़ी मेरी आँख से गीली हो गई
अब तुम इसे सुखाओगी कैसे
क्या तुम्हारे पाँव पर मेरे हाथ की छुअन छूट गई
अब तुम इसे छुपाओगी कैसे
क्या थोड़ी देर और सटकर बैठे रहना था खेत की मिट्टी में
अब हम इसे दोहराएँगे कैसे

हम जहाँ-जहाँ मिले
बैठकर जीवन के दिन सिले
मैंने समय की कटाई की
और तुमने तुरपायी
वहाँ-वहाँ कुछ न कुछ तो उग ही रहा होगा
आक धतूरा या ईख की पेंगें
हम उन्हें ही देख-देख जी लेंगे

टहनी और फूल

तुम अच्छी तरह नहा सकती थी
सो तुम खूब-खूब नहायी
धूप में खड़ी हो सकती थी सो हुई
गीले केश सुखाए

तुम सपना देख सकती थी
पूरे रास्ते सपना देखती हुई आई
फिर हम फुटपाथ पर बैठे ऐसे
फूल टहनी से कुछ कह रहा हो जैसे
तुम न होती तो मैं होता कैसे

कुछ समय के लिए ही सही
जीवन तो जीवन होता है
जब नहीं होता तब नहीं होता
टहनी का सूखते हुए वक्त गुजरता है
फूल का मुरझाते हुए

धुन

उस बेढंगी हरकत को क्या कहा जाए
कि तुमने पृथ्वी को पीटा था छड़ी से
युगों बाद समझ में आया
तुम तो छड़ी से बाँसुरी बना रही थी
पृथ्वी से अपने लिए एक धुन चाह रही थी

तुम

अलभोर में गायों का गोबर उठाती तुम कितनी प्यारी लगती थी
भोर में आँगन लीपती तुम कितनी प्यारी लगती थी
लीपे हुए आँगन में माँडने माँडती तुम कितनी प्यारी लगती थी
थकहार कर सो जाती तुम कितनी प्यारी लगती थी
जगते ही मुझे को ढूँढते हुई तुम कितनी प्यारी लगती थी

फिर कहाँ गई तुम
किसने तुम्हें धुँए में बदल दिया

तुम

तुमने कहना नहीं चाहा
लेकिन कहा
पेड़ से बाँध दो इसे
खाल उधेड़ो इसकी
इच्छा पूरी करो बस्ती की
बाकी मुझे बेच दो
या शादी करो
रहूँगी तो इसी की
कौन है जो मेरे लिए
मरने यहाँ आया है

घर

अप्रेल की उस दोपहर
सड़क किनारे के नीमों से
झर रहे थे सफेद फूल

मैं सब्जीमण्डी की तरफ से आ रहा था
मरीचिकाओं से भरी सड़क पर
एक स्त्री आ रही थी एक बच्चे को गोद में लिए
एक बच्ची को हाथ की उँगली पकड़ाए

वह जैसे-जैसे पास आई
मेरी धड़कनें एकाएक बढ़ गई
पैर काँपने लगे

वह पास आ गई
बरसती धूप में मत खड़ा रह
उधर चल छाया में

मुझे यह तो पता था
तू इस शहर में रहता है
यह नहीं जानती थी कि
किसी रोज मिल ही जाएगा
अब कैसा है तू
कहते हुए उसकी आँखें छलक आई

मैंने दोनों बच्चों की तरफ देखा
एक पेट में भी है- वह बोली
बच्चे पैदा करने की मशीन बना रखा है उसने मुझे
बदला ले रहा है वह मुझसे
हमारी बात सब जगह फैल गई थी रे!

घर चल
उसने मेरी आँखों के घर में झाँकते हुए कहा

मैं आगे बढ़ गया
वह सब्जीमण्डी की तरफ चली गई

छींट का कुर्ता

छींट का कुर्ता
छींट की सलवार
फूलों को क्या हो गया
ऐसे खिलते हैं जैसे
आज-आज ही है प्यार
फिर मुरझाना है
फिर झड़ जाना है
मगर फूल जाते-जाते
अपना रंग छींट जाते हैं सड़क पर
जिस पर इतनी मोटर गाड़ियाँ चलती हैं
और साइकिलें भी
सड़क किनारे बैठने वाला दर्जी देख लेता है
और कैरियर में टिफिन है या नहीं
बिना इसकी परवाह किए सोचता है
पहले से भी बढ़िया सिलना है इस बार
छींट का कुर्ता
छींट की सलवार

•••

प्रभात हिंदी के सुपरिचित कवि हैं। उनके दो कविता संग्रह ‘अपनों में नहीं रह पाने का गीत’ (साहित्य अकादमी) और ‘जीवन के दिन’ (राजकमल प्रकाशन) से प्रकाशित हैं। उनसे prabhaaat@gmail.com पर बात हो सकती है।

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