क्या प्रेम भी पतझड़ जैसा ही होता है

 

नए पत्ते ::
कविताएँ : विभा परमार

विभा परमार

उदासी

चूंकि सर्दियों का उदास मौसम अब जा चुका है और अपने पीछे छोड़ गया है पतझड़,
जो झड़ रहा है क्षण-क्षण शायद इस क्षण-क्षण में
मैं भी झड़ी जा रही हूँ उन सूखी पत्तियों की तरह जो चुपचाप झड़कर पड़ी रहती हैं पेड़ों के नीचे

जिनको छूने भर से ही त्याग देती हैं वे अपना शरीर!

सोचती हूँ कि
क्या प्रेम भी पतझड़ जैसा ही होता है-

जो धीरे धीरे झड़ने लगता है!

फ़िर ख़्याल कौंधता है कि मैं भी सूखी पत्तियों सरीखी हो चली हूँ
मैंने कभी ख़ुद को समेटा नहीं, बहने दिया भाव को
प्रेम के उदात्त क्षणों में
मगर शायद ग़लत हूँ,
जिस बेकली से मैं तुम्हारा इंतज़ार करती हूँ, तुम्हें सुनना चाहती हूँ, तुम पर अपना नेह लुटाना चाहती हूँ
उस वक्त तुम या यूं कहो तुम्हारे पास अब अनगिनत मशीनी बातें रहने लगी हैं
वरना कुछ पहर पहले तक सिर्फ़ नेह ही रहता था,

जब-जब तुमसे स्वयं को प्रकट किया तुमने उसके बाद से मुझे हल्की बूंदों की तरह लेना शुरू कर दिया!
सच में कितना अटपटा होता है अपने चाहनेवाले की नज़रों से ख़ुद को हल्का होते हुए देखना!

दीवार

जब मन उचाट से भर गया, या फ़िर लगा कि बस जो कहना चाहती रही वो नहीं सुना गया
तब मैं बेकली से अपने कमरों की दीवारों को देखने लग गई और उस वक्त सोचने लगी
कि कितना धैर्य है इन दीवारों में जो मेरी बड़बड़ाहट को सुने जा रही हैं कितना यथार्थ होता है ना कि
वक्त के साथ तो हर इंसान भी एक ही बात को सुनते-सुनते ऊब जाता है मगर ये,
ये वक्त के साथ सुनने में और परिपक्व हो चली हैं!

इनसे मेरा रिश्ता बस इतना सा है कि ये ईंटों, सीमेंट से बनी हैं और मैं जीती जागती बोलती लड़की!
ना जाने मैंने कितनी ही बार एक ही बात को हज़ारों-बार कहा होगा,
कितने ही दुखों को इनके सामने चिल्ला-चिल्ला कर व्यक्त किया होगा,
लेकिन इनके कान, मेरी चिल्लाहट से बहरे नहीं हुए,
मुझसे रत्तीभर के लिए उक्ताई नहीं,
कितने ही रहस्यों को सुनकर अपने में समेटे हुईं
बिना कहे कुछ मेरा भार उठाए
मुस्कुराती ये दीवारें!

ख़त

मेरा मन तुम्हारे लिए ख़ूबसूरत ख़त है
जिसे तुम हमेशा अपनी ज़िंदगी से जोड़ते हो
इस ख़त को जब-जब तुम पढ़ते हो ना
तब हर्फ़ से अपने आप आकृतियां बनने लगती है
जिसमें वो सब क्रियाएं-प्रतिक्रियाएं सजीव दिखती है
मानों हम तुम्हारे सामने हों।

ख़त में सूरज की सुहानी सुबह
दिन का एक-एक क्षण
गोधूलि सांझ
और रात की अपार शिकायतें रहती है

और…और
तुम्हारी शर्ट के टूटे बटन
तुम्हारी व्यस्तताएं
बहुत सारी सिगरेट
बेसमय की नींद

जिनको पढ़कर तुम कुछ कहते नहीं

बस धुंधले चांद की तरह मुस्कुराते रहते हो।

•••

विभा परमार बरेली, उत्तर प्रदेश से आतीं हैं, पत्रकारिता से मास्टर्स किया है और इनदिनों रंगकर्म में सक्रिय हैं। कविताएँ-कहानियाँ, कई पत्रिकाओं-पोर्टलों में प्रकाशित। विभा से parmar.vibhar@gmail.com पर बात की जा सकती है।

About the author

इन्द्रधनुष

जब समय और समाज इस तरह होते जाएँ, जैसे अभी हैं तो साहित्य ज़रूरी दवा है. इंद्रधनुष इस विस्तृत मरुस्थल में थोड़ी जगह हरी कर पाए, बचा पाए, नई बना पाए, इतनी ही आकांक्षा है.

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