मार्गरेट एटवुड के कुछ उद्धरण ::
अनुवाद एवं प्रस्तुति : उत्कर्ष

मार्गरेट एटवुड (जन्म : १८ नवम्बर १९३९) प्रसिद्ध कनाडाई उपन्यासकार हैं, जिनकी साहित्यिक परिधि में उपन्यास के अलावा आलोचना, कविता, लेख आदि विधाएँ आती हैं। उनकी उपन्यास-श्रृंखला ‘द हैंडमेड्स टेल’ उनकी सर्वाधिक प्रसिद्ध और प्रभावशाली रचनाओं में शामिल है। वह दो बार प्रतिष्ठित बुकर सम्मान से नवाज़ी जा चुकी हैं। उनकी कृतियों में हमें राजनीति, धर्म, मिथक, जलवायु परिवर्तन, स्त्री-अधिकार जैसे कई विषयों की पड़ताल और उनकी व्याख्या का मजबूत दस्तावेज मिलता है। प्रस्तुत उद्धरण उनकी विभिन्न रचनाओं और साक्षात्कार से चुने गए हैं और इंटरनेट के विभिन्न स्रोतों से साभार लिए गए हैं। यह अंग्रेजी से हिंदी भावानुवाद इस आशा से भी पाठकों के समक्ष है कि हमारे समय की एक महत्वपूर्ण लेखिका से उनका लघु-परिचय हो सके, जिससे उन्हें जानने की यह यात्रा विस्तार में उनकी रचनाओं के सम्पूर्ण पाठ तक ले जा सके, उनके रचना-संसार के वैविध्य और प्रासंगिक अंतर्वस्तु से अवगत हो सके।

मैं ख़ुशी के लिए पढ़ती हूँ, और उसी पल मैं सबसे अधिक सीखती हूँ।

हम जब अतीत के बारे में सोचते हैं, तो हम अच्छी चीजें चुनते हैं।  हम विश्वास करना चाहते हैं कि सबकुछ वैसा ही था।

सपनों में समय जमा हुआ होता है।  जहाँ तुम थे, वहाँ से कभी तुम दूर नहीं जा सकते।

देखने के, बोलने के पहले, आता है स्पर्श।  यह पहली और आखिरी भाषा है, और ये हमेशा सच बोलता है।

रात गिरती है।  या गिर गई होती है। ऐसा क्यों है कि रात गिरती है, उठने की जगह, जैसे सुबह ? फिर भी अगर तुम पूरब की ओर देखो, शाम की ओर, तुम रात को उठते देख सकते हो, ना कि गिरते; अँधेरा आसमान की ओर उठते हुए, क्षितिज से उठते हुए, बादलों के आवरण के पीछे के सूरज की तरह।  अनदेखी आग से उठते उस धुँए की तरह, क्षितिज के ठीक नीचे आग की रेखा, झाड़ी में लगी आग या एक जलता हुआ शहर।  शायद रात गिरती है, क्योंकि यह भारी होती है, एक सघन पर्दा आँखों के ऊपर ओढ़ा दिया हुआ।  ऊनी। चादर।

शायद मैं किसी के लिए नहीं लिखती।  शायद उसी के लिए, जिनके लिए बच्चे लिखते हैं, जब अपना नाम काढ़ते हैं बर्फ़ में।

कलाकार यह जरूरी नहीं कि संवाद करता ही है। कलाकार जागृत करता है… यह जरूरी नहीं कि मैं कैसा महसूस करती हूँ।  यह जरूरी है कि कला आपको कैसा महसूस करा पाती है।

लोग मुझसे अक्सर पूछते हैं, ‘आपकी स्त्री-पात्र मानसिक रूप से इतनी संभ्रमित क्यों रहती हैं?’ यह उन्माद नहीं है।  यह उनकी परिस्थिति की पहचान करना है।

सारे लेखक भाषा की सीमितता से असहाय सा महसूस करते हैं। सारे गंभीर लेखक।

अगर मैं सर्वोत्कृष्ट की प्रतीक्षा करती…मैं कभी एक भी शब्द नहीं लिख पाती।

‘द हैंड्समैड टेल’ से उद्धरित-अनूदित अंश :

मैं थाम लिए हुए और अपने नाम से पुकारा जाना चाहती हूँ। मेरा महत्व समझा जाना, अभी के अर्थों से अलग; मैं कीमती से बहुत अधिक होना चाहती हूँ। मैं अपना पुराना नाम दुहराती हूँ; खुद को याद दिलाती हूँ कि पहले मैं क्या कर सकती थी, कैसे लोग मुझे देखते थे।  मैं कुछ चुरा लेना चाहती हूँ।

तुम बस खुद को कहानी नहीं सुना रहे होते।  हमेशा कोई और भी होता है। अगर कोई नहीं होता, तो भी।

और अंत में, हम सभी एक दिन कहानियाँ बन जाते हैं।

तुम आसमान का गिरना तबतक नहीं मान लेते, जबतक कि इसका कोई एक टुकड़ा तुम्हारे ऊपर गिर नहीं जाता।

और जैसा कि सभी कहते हैं, इतिहास खुद को कभी नहीं दुहराता। लेकिन यह तुक मिलाता है।

मेरा नाम ओफ्रेड नहीं है, मेरा नाम कुछ और है, जो कोई नहीं पुकारता, क्योंकि ऐसा करना मना है। मैं खुद से कहती हूँ कि कोई बात नहीं।  एक नाम बस किसी दूरभाष संख्या की तरह होता है, जिसका मतलब बस दूसरों के लिए ही होता है; लेकिन यह मैं गलत कहती हूँ खुद से, यह मतलब रखता है।

लेकिन दर्द को कौन याद कर सकता है, जब यह ख़त्म हो जाता है? जो भी इसका बचता है वह है एक परछाई, दिमाग में नहीं, शरीर में। दर्द तुम्हारे भीतर अपनी छाप छोड़ता है, लेकिन इतना ज्यादा गहरा कि दिखाई नहीं देता। दृश्य से परे, मन से परे।

हम वे लोग थीं, जो पन्नों में नहीं थीं। हम छपाई के हाशिये के सफ़ेद ख़ाली जगहों में रहती थीं। यह हमें ज़्यादा आज़ादी देता था। हम कहानियों के बीच की ख़ाली जगहों में रहती थीं।

जब हम अतीत के बारे में सोचते हैं, तो सुंदर चीज़ों को चुनते हैं। हम ऐसा यकीन करना चाहते हैं कि सबकुछ ऐसा ही था।

भूलभुलैया में रहनेवाला चूहा कहीं भी जाने के लिए आज़ाद है, जबतक वह उसी भूलभुलैया के भीतर रहे।

आँट लिडिया ने कहा कि सबसे अच्छा है कुछ भी न बोलना जबतक वे कोई सीधा सवाल न पूछें। ‘उनके हिसाब से सोचो’, उन्होंने कहा, उनके हाथ कसकर एक-दूसरे में समाए हुए, काँपते हुए।  उनकी घबराई, विनती करती मुस्कुराहट । यह सब उनके लिए आसान नहीं है।

जानना एक प्रलोभन था।  जो तुम नहीं जानते, वह तुम्हें आकर्षित नहीं कर सकता।

बेहतर सबके लिए बेहतर नहीं होता… हमेशा इसका मतलब कुछ के लिए बहुत बुरा भी होता है।

मैं यह विश्वास करना चाहूँगी कि यह एक कहानी है जिसे मैं कह रही हूँ। मुझे ऐसा विश्वास करने की जरूरत है।  मैं जरूर यकीन करती हूँ।  जो ऐसा यकीन कर सकते हैं कि इस तरह की कहानियाँ सिर्फ कहानियाँ हैं, उनके पास बेहतर मौका है। अगर यह कहानी मैं कह रही हूँ, तो मुझे इसके अंत पर नियंत्रण है। तब इसके बाद जब समाप्ति हो जाएगी, इस कहानी की, तो इसके बाद असल जीवन शुरू होगा। मैं तब वहाँ से शुरुआत कर सकती हूँ, जहाँ इसे छोड़ा था।

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उत्कर्ष कवि-अनुवादक हैं। उनसे yatharthutkarsh@gmail.com पर सम्पर्क किया जा सकता है।

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