सखि, वसन्त-से कहाँ गये वे

कविता-भित्ति ::
मैथिलीशरण गुप्त की यशोधरा से एक काव्य-खंड

मैथिलीशरण गुप्त

सखि, वसन्त-से कहाँ गये वे,
मैं उष्मा-सी यहाँ रही।
मैंने ही क्या सहा, सभी ने
मेरी, बाधा-व्यथा सही।

तप मेरे मोहन का उद्धव धूल उड़ाता आया,
हा! विभूति रमाने का भी मैंने योग न पाया।
सूखा कण्ठ, पसीना छूटा, मृगतृष्णा की माया,
झुलसी दृष्टि, अंधेरा दीखा, दूर गयी वह छाया।
मेरा ताप और तप उनका,
जलती है हा! जठर मही,
मैंने ही क्या सहा, सभी ने
मेरी, बाधा-व्यथा सही।

जागी किसकी वाष्पराशि, जो सूने में सोती थी ?
किसकी स्मृति के बीज उगे ये सृष्टि जिन्हें बोती थी?
अरी वृष्टि, ऐसी ही उनकी दया दृष्टि रोती थी,
विश्व वेदना की ऐसी ही चमक उन्हें होती थी।
किसके भरे हदय की धारा,
शतधा हो कर आज बही?
मैंने ही क्या सहा, सभी ने
मेरी, बाधा-व्यथा सही।

उनकी शान्ति-कान्ति की ज्योत्स्ना जगती है पल-पल में,
शरदातप उनके विकास का सूचक है थल-थल में,
नाच उठी आशा प्रति दल पर किरणों की झल-झल में,
खुला सलिल का हृदय-कमल खिल हंसों के क्ल-क्ल में।
पर मेरे मध्याह्न! बता क्यों
तेरी मूर्च्छा बनी वही?
मैंने ही क्या सहा, सभी ने
मेरी, बाधा-व्यथा सही।

हेमपुंज हेमन्तकाल के इस आतप पर वारूं,
प्रियस्पर्श की पुल्कावलि मैं कैसे आज बिसारूँ ?
किन्तु शिशिर, ये ठण्डी साँसें हाय! कहाँ तक धारूं ?
तन गारूं, मन मारूं, पर क्या मैं जीवन भी हारूं ?
मेरी बांह गही स्वामी ने,
मैंने उनकी छाँह गही,
मैंने ही क्या सहा, सभी ने
मेरी, बाधा-व्यथा सही।

पेड़ों ने पत्ते तक, उनका त्याग देख कर, त्यागे,
मेरा धुँधलापन कुहरा यन छाया सबके आगे।
उनके तप के अग्नि-कुण्ड से घर-घर में हैं जागे,
मेरे कम्प, हाय! फिर भी तुम नहीं कहीं से भागे।
पानी जमा, परन्तु न मेरे
खट्टे दिन का दूघ-दही,
मैंने ही क्या सहा, सभी ने
मेरी, बाधा-व्यथा सही।

आशा से आकाश थमा है, श्वास-तन्तु कब टूटे ?
दिन-मुख दमके, पल्लव चमके, भव ने नव रस लूटे!
स्वामी के सद्भाव फैल कर फूल-फूल में फूटे,
उन्हें खोजने को ही मानों नूतन निर्झर छूटे।
उनके श्रम के फल सब भोगें,
यशोधरा की विनय यही,
मैंने ही क्या सहा, सभी ने
मेरी, बाधा-व्यथा सही।

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राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त (३ अगस्त १८८६–१२ दिसम्बर १९६४) हिंदी कविता में एक सर्व-प्रतिष्ठित नाम हैं।  प्रस्तुत काव्य-खंड ‘यशोधरा’ से पाठकों के समक्ष प्रस्तुत है, जिसमें सिद्धार्थ के वन-गमन के उपरांत यशोधरा के मार्मिक भावों को कवि प्रभावशाली रूप से प्रस्तुत करते हैं। हिंदी साहित्य को गुप्त जी ने ‘साकेत’, यशोधरा’, ‘भारत-भारती’, ‘जयद्रथ वध’, ‘किसान’, ‘सैरंध्री’, आदि यशस्वी रचनाओं से समृद्ध किया है। खड़ी बोली के इस विशिष्ट कवि को सन १९५४ में भारत सरकार ने पद्मभूषण से सम्मानित किया।

About the author

इन्द्रधनुष

जब समय और समाज इस तरह होते जाएँ, जैसे अभी हैं तो साहित्य ज़रूरी दवा है. इंद्रधनुष इस विस्तृत मरुस्थल में थोड़ी जगह हरी कर पाए, बचा पाए, नई बना पाए, इतनी ही आकांक्षा है.

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