कविता : जीवकान्त
मैथिली से अनुवाद : तारानंद वियोगी

जीवन के रास्ते

नहीं, ज्यादा रंग नहीं
बहुत थोडा-सा रंग लेना
रंग लेना जैसे बेली का फूल लेता है शाम को
रंग लेना बस जितना जरूरी हो जीवन के लिए
रंग लेते हैं जितना आम के पत्ते
नए कलश में।

नहीं, ज्यादा गंध नहीं
गंध लेनी है बहुत थोड़ी सी
बहुत थोड़ी सी गंध जितनी नीम-चमेली के फूल लेते हैं
गंध उतनी ही ठीक जितनी जरूरी हो जीवन के लिए
गंध जितनी आम के मंजर लेते हैं।

नहीं, बहुत शब्द नहीं
जोरदार आवाज नहीं
आवाज लेना जितनी गौरैया लेती है अपने प्रियतम के लिए
जरूरी हो जितनी जीवन के लिए
आवाज उतनी ही जिसमें बात करते हैं पीपल के पत्ते हवा से,
थोड़ी-सी आवाज लेना
जितनी कि आंगन का जाँता गेहूं के लिए लेता है।

जीवन के रास्ते हैं बड़े सीधे
दिखावा नहीं, बिलकुल दिखावा नहीं
बरसता-भिंगोता बादल होता है जीवन
बरसते बादल में लेकिन रंग होते हैं बहुत थोड़े
ध्वनि भी होती है तो साधारण
गंध भी होती है उसमें
विरल गंध।

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जीवकांत समादृत मैथिली कवि-कथाकार हैं। प्रस्तुत कविता संवेद-87-88 : अप्रैल-मई 2015 जीवकांत केंद्रित अंक (अ. संपादक – तारानन्द वियोगी) में पूर्व-प्रकाशित है। इस कविता का मैथिली से अनुवाद तारानन्द वियोगी ने किया है। उनसे tara.viyogi@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है। उनसे और परिचय और इंद्रधनुष पर उनके पूर्व-प्रकाशित कार्य के लिए देखें : हर किसी से कुछ न कुछ छूटता है

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