गद्य ::
राकेश
कुमार मिश्र

कला, साहित्य और संगीत : कुछ नोट्स

(1.)

कला को जीने का समय सबसे महत्वपूर्ण समय है. इसका मतलब ये नहीं कि कला के दूसरे क्षणों का महत्व नहीं है. कला की ‘तैयारी’ मुझे कला के ‘सम्प्रेषण’ से कहीं ज्यादा आकर्षित करती है. मेरे लिये कला की ‘तैयारी’ का ये मतलब नहीं है कि किसी कला या अपने काम पर बहुत व्यवस्थित होकर काम करना. पर इसके बजाए कला के हर छोटे से छोटे हिस्से को जानने की कोशिश करना. जब कोई भी कलाकार काम करना शुरू करता है तो ये देखना दिलचस्प होता है कि वो किस तरह से अपने काम के हर छोटे और मामूली हिस्से को जानने, समझने और बेहतर बनाने की कोशिश कर रहा है. चाहे कला का कोई भी माध्यम हो, सृजन का सुख और प्रसव पीड़ा दोनों ही जीवन भर किसी कलाकार के साथ रहते हैं. कला के ‘सम्प्रेष्ण’ के बाद कला कलाकार के हाथ में नहीं रह जाती. कला का ‘सम्प्रेष्ण’ कला की विदाई भी है. अपनी कला का ‘सम्प्रेषण’ करते समय कलाकार अपने कुछ निहायती निजी अनुभवों को विदा कर रहा होता है, इस भरोसे के साथ कि शायद इन अनुभवों को कोई जानने, समझने और इनका हिस्सा बनने की कोशिश करेगा. कल सत्यजीत रे की अप्पू ट्राइलॉजी देखने के बाद घंटों ‘कला की तैयारी’ वाले पक्ष पर सोचता रहा.‘कला सम्प्रेषण’ का जीवन कितना छोटा है?

(2.)

कला बोध से अबोध की यात्रा है. कला के साथ रहने के लिए बोध से ज्यादा अबोध होने की ज़रूरत है. अबोधपन वो स्थिति है जिसमें ये एहसास लगातार बना रहता है कि मुझे क्या-क्या नहीं पता. और मैं कितना कम जानता हूँ. बिना अबोधपन के कला के साथ नहीं रहा जा सकता. बोध का भाव कुछ-कुछ संतोष की तरह लगता है. पर ये भटका भी सकता है. अबोधपन ही असल में किसी कलाकार को बचाए रखता है.

(3.)

कला के किसी भी रूप के पास जाते हुए डर लगता है. हर कला एक ऐसी दुनिया है जहाँ से लौटना संभव नहीं है और यह बात उन्हीं लोगों पर लागु होती है जिन्होंने कला के किसी रूप को ईमानदारी से छुआ है .

(4.)

मणि कौल की डाक्यूमेंट्री सिद्धेश्वरी (1989) देखते हुए बहुत कुछ समझ में नहीं आया. जो समझ में आया वो है उनकी तैयारी. तमाम कलाओं से उनका अथाह प्रेम. सिनेमा की दुनिया में रहते हुए भी कोई दूसरी कलाओं से किस हद तक संवाद स्थापित कर सकता है, मणि कौल जी का रचना संसार इसका सुंदर उदहारण है. मणि सर कठिन हैं पर उन तक बार-बार पहुँचने का मन करता है.

(5.)

क्या निर्मल वर्मा को पढ़ने का एक तरीका ये हो सकता है की आप कई दिनों तक भूखे रहें ? अन्न, जल और वायु से दूर रहें और फिर निर्मल वर्मा को पढ़ें. मुझे लगता है की निर्मल वर्मा को पढ़ते हुए आपको अन्न, जल और वायु, तीनों मिलते हैं. निर्मल वर्मा का साहित्य “अमृत-मंथन” से निकला साहित्य है. निर्मल वर्मा की हर कहानी वेद की किसी सूक्ति की तरह लगती है, जिसका अर्थ खोजने में शायद पूरा जीवन निकल जाए. अपने तमाम अबोलेपन और अनकहेपन के बावजूद निर्मल वर्मा उस पीड़ा को हमारे सामने रख देते हैं जो हमें मनुष्य होने के कारण भोगनी पड़ती है. हमारी गलती सिर्फ इतनी है कि हम मनुष्य हैं. हमारी एक देह है और ये देह इस संसार से जुड़ी हुई है.

(6.)

रघु जी (हिंदी के महत्वपूर्ण कथाकार स्वर्गीय रघुनंदन त्रिवेदी) को पढ़ते हुए चेखव की बार-बार याद आती है. किसी सुंदर वाक्य की तरह यह बात भी कितनी सुंदर है कि रघु जी चेखव को बेहद पसंद करते थे. रघु जी के देहांत के बाद उनके घर से जो दस्तावेज़ मिले उनमें चेखव की कई कहानियाँ भी शामिल थीं. उन्होंने हिंदी कहानी में अपने लिए अलग तरह की जगह बनाई. उनकी कहानियों में भाषा का खिलवाड़ नहीं है बल्कि भाषा को साधने की गजब की ललक है. रघु जी इंक पेन से लिखते थे. जब मैंने पहली बार उनकी हैंडराइटिंग देखी तो ये लगा कि जैसे स्कूल जाने वाला कोई बच्चा पूरे एकाग्रता से अपना होमवर्क लिख रहा हो.

(7.)

कला को समझने एक तरीका ये भी हो सकता है कि कला को समझने की कोशिश ना की जाए. कला को समझने जैसी कोई स्थिति होती भी नहीं. कला तक पहुँचा जा सकता है. बिना किसी पूर्वाग्रह के किसी कलाकृति या कलाकार तक पहुँचा जाये तो कोई रास्ता निकल सकता है. कला या कलाकार तक पहुंचने का रास्ता कलाकृति को समझने का रास्ता नहीं.

(8.)

कला के दो पक्ष हैं. पहला पक्ष है: अभ्यास पक्ष. दूसरा पक्ष है: वैचारिक पक्ष. एक कलाकार जो अपने अभ्यास पक्ष में पारंगत है, कोई ज़रुरी नहीं की वह अपने वैचारिक पक्ष में भी उतना ही पारंगत हो.यह बात सिर्फ कला पर ही लागू नहीं होती बल्कि यह बात दुनिया के हर पेशे और काम पर लागू होती है. कम से कम हर इंसान को अपने काम के अभ्यास पक्ष और वैचारिक पक्ष के बारे में पता होना चाहिए.

(9.)

भारतीय शास्त्रीय संगीत का जो रियाज़ वाला पक्ष है, वो मुझे सबसे ज़्यादा आकर्षित करता है. बिना रियाज़ किए हुए आप अच्छे गायक या वादक नहीं हो सकते और गुरु का काम है कि वो अपने शिष्य को रियाज़ करना सिखाए. रियाज़ का रास्ता मुश्किल है. इतना मुश्किल इसलिए कि ये जीवन भर करना है. हाल ही में हमारे समय के प्रतिष्ठित शास्त्रीय गायक मधुप मुद्गल जी का हिन्दू (15 दिसम्बर, 2018) में छपा इंटरव्यू पढ़ रहा था. एक जगह उन्होंने कहा कि, “नए गायकों को कम-से-कम बारह घंटे रियाज़ करना चाहिए”. ये कथन लगातार मेरे दिमाग में बना रहता है. इस कथन को समझने की कोशिश करता रहता हूँ. बारह घंटा रियाज़ करने का क्या मतलब है? भले ही मैं शास्त्रीय गायक नहीं बनना चाहता, लेकिन क्या मेरे पास इतना धैर्य है?

मैं अपने आप से ये सवाल लगातार पूछना चाहता हूँ कि मैं पढ़ने-लिखने के लिए कितना रियाज़ कर रहा हूँ?

(10.)

किसी अभिनेता का सबसे बड़ा सपना क्या हो सकता है? जवाब : वो कुछ ऐसा करे कि दर्शक और अभिनेता के बीच जो अदृश्य दीवार है, वो ध्वस्त हो जाये. अभिनेता होना उस जादू की खोज है, जिस जादू में कोई अभिनेता अपने दर्शक को डूबाकर आश्चर्य के पहाड़ पर उसे अकेला छोड़ दे. अभिनय जादू और सहजता की आराधना है. यानी कोई अभिनेता अपने अभिनय में इतना सहज हो जाए कि ‘असल’ और ‘अभिनय’ का फर्क खत्म हो जाए. टौड फिलिप्स द्वारा निर्देशित फ़िल्म जोकर (2019) देखते हुए बार-बार ये सवाल दिमाग में आया कि अभिनय को कैसे समझा जाए ? जोकर के अभिनय में वाकिन्स फिनिक्स के अभिनय को सिर्फ अच्छा कह देना आलस्य का जश्न होगा. फिनिक्स ने भविष्य के अभिनेताओं के लिए अभिनय के उस रास्ते को खोला है, जिस रास्ते पर चलना किसी अभिनेता के लिए आसान नहीं होगा. टौड फिलिप्स ने अपनी फ़िल्म में लाफ्टर के हर उस रंग को दिखाया है, जो सिर्फ अंधकारमय ही नहीं डरावना भी है. पूरी फ़िल्म में वाकिन्स फिनिक्स को अपनी हँसी को रोक पाने की असफल कोशिश में देखा जा सकता है. जोकर की भूमिका में फिनिक्स अपने तबाह होते जीवन में अनेक लोगों से मिलता है, जो उसके हँसी को अपमान की तरह देखते हैं. जोकर के हँसी पर थोड़ा ठहरकर सोचे तो पाएंगे कि वो किसी और पर नहीं बल्कि ख़ुद पर हँस रहा है. अपने जीवन की उन तमाम त्रासदियों पर हँस रहा है, जो अभिशाप बनकर उसके साथ हैं.

(11.)

बच्चों को कला से कैसे जोड़ा जाये? बच्चों को किसी बड़े कलाकार के बारे में कैसे बताया जाये? हिंदी के वरिष्ठ कवि और सम्पादक उदयन वाजपेयी जी की मशहूर चित्रकार सैयद हैदर रज़ा पर बच्चों के लिए लिखी किताब रज़ा के चित्र (2022) पढ़ते हुये स्वभाविक रूप से ये सवाल दिमाग में आये. रज़ा के चित्रों को देखते हुए लगता है की आप कोई लम्बी कविता पढ़ रहे हैं. एक ऐसी लम्बी कविता जिसमें हिंदी कविता का आवागमन लगातार बना रहता है. एक चित्रकार जो कविता से अथाह प्रेम करता है, उसके चित्र कैसे होंगे ? ऐसे किसी भी कलाकार के चित्र रज़ा साहब के चित्र जैसे होंगे.

(12.)

आदिवासी समाज कथाओं का अथाह समंदर है. इस समाज के पास हर अवसर, घटना और वस्तु के लिए कथा है. ये कथायें एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक नए संस्करण में पहुँचती हैं. हर पीढ़ी इस कथा में कुछ नया जोड़ देती है. मध्य प्रदेश के भोपाल में स्थित आदिवासी संग्रहालय को देखते हुए आदिवासी जीवन के व्यापकता का बोध बार-बार होता है .

इस संग्रहालय का एक हिस्सा ये बताता है कि किस तरह पृथ्वी का जन्म हुआ? और पास ही स्थित एक दूसरा कोना अपने पूर्वजों को याद करने की कोशिश है. शायद ये भारत का पहला संग्रहालय है, जिसमें लाइटिंग का इतना शानदार इस्तमाल किया गया है.

(13.)

अमित दत्ता का सिनेमा चित्रकारी का विस्तार है. उनकी फ़िल्म नैन सुख (2010) को देखते हुए लगा की मैं किसी बड़े कैनवास पर बने विशालकाय चित्र को देख रहा हूँ. नैन सुख फ़िल्म का एक-एक फ्रेम किसी मिनिएचर पेंटिंग की तरह मेरे भीतर बना रहता है. किसी मिनिएचर पेंटिंग में जो डिटेलिंग हमें देखने को मिलता है, उस तरह की डिटेलिंग अमित दत्ता के इस फ़िल्म में भी है. ये सिर्फ संयोग नहीं है कि अमित दत्ता ने महत्वपूर्ण फ़िल्मकार  मणि कौल को गुरु के तौर पर देखा है. मणि कौल के सिनेमा की तरह अमित दत्ता के फिल्मों में भी मौन भाषा के रूप में उपस्थित है. दोनों के सिनेमा में संवाद कम से कम हैं. दोनों ही फिल्मकार दृश्यों में उपस्थित मौन के कारण बार-बार ध्यान खींचते हैं.

(14.)

आबिदा परवीन की आवाज़ इबादत की आवाज़ है .आबिदा की आवाज़ में हीर सुनते हुए लगता है, वो पूरे मन और शिद्दत से ख़ुदा को बुला रही हैं. आबिदा की आवाज़ में हीर सुनते हुए आसमान के सारे पर्दे खुलने लगते हैं. इस आवाज़ को सुनने के बाद हम एक ऐसे रास्ते पर निकल पड़ते हैं, जहाँ सिर्फ विरह है.

(15.)

पिछले कुछ सालों से गांधीजी लगातार मेरे जीवन में प्रवेश कर रहे हैं. वो जल्दी में नहीं हैं और मैं भी जल्दी में नहीं हूँ. गांधीजी की किताब हिन्द स्वराज मैंने हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों में पढ़ा है. इसके अलावा आशीष नंदी, त्रिदिप सुहृद, शिव विश्वनाथन, रामचन्द्र गुहा जैसे चिंतकों को लगातार पढ़ने की कोशिश की है. पर हमारे समय के महत्वपूर्ण इतिहासकार प्रो. सुधीर चन्द्र की किताब गांधी : एक असम्भव सम्भावना  (2011) को पढ़ते हुए लगा की मैं वाकई में कुछ नया पढ़ रहा हूँ. ये किताब गांधीजी के अंतिम दिनों के बारे में है. इस किताब को पढ़ते हुए ये देखना और जानना बहुत दर्दनाक है कि गांधीजी अपने अंतिम दिनों में किस हद तक परेशान थे. वो किस हद तक अकेला पड़ गए थे. किस हद तक ख़ुद को थका हुआ महसूस कर रहे थे. इसमें कोई शक नहीं कि गांधीजी के कई रूप थे .पर गांधीजी की अपने अंतिम पड़ाव पर जो स्थिति थी, वो कई तरह के सवाल पैदा करती है. प्रो. सुधीर चन्द्र की किताब सिर्फ गांधीजी के अंतिम दिनों के बारे में नहीं है, बल्कि गांधीजी को ‘देखने’ के बारे में है. साथ ही, ये किताब गांधीजी को देखते हुए ख़ुद को ‘देखने’ के लिए भी उकसाती है. ये एक बड़ी जिम्मेदारी है कि, “हर कोई अपने को देखे, बगैर देखे की दूसरे अपने को देख रहे हैं या नहीं”. गांधीजी इस किताब में कुम्भ मेले में छोड़ दिए गए उस बुजुर्ग असहाय वृद्ध की तरह दिख रहे हैं, जिसे अब कोई लेने नहीं आएगा .पर अचरज होता है कि इतनी हताशा में भी कोई उम्मीद कैसे खोज सकता है? उनका तन-मन लगातार टूट रहा है. आधा पेट खाकर वो बंगाल में पैदल घूम रहे हैं. ये सबकुछ किसी फ़िल्म की तरह आँखों के सामने से गुजरता है. इतिहास और वर्तमान का फर्क खत्म होने लगता है.

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 राकेश कुमार मिश्र कवि-गद्यकार हैं. उनसे rakeshansh90@gmail.com पर बात हो सकती है.

 

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