एक सरोद जो जल गया

कविताएँ ::
कुमार मंगलम

कुमार मंगलम

इब्ने-मरियम हुआ करे कोई
(उस्ताद अलाउद्दीन ख़ाँ के सरोद को और उनके घर को जो एक प्रदर्शन-स्थल था, को बांग्लादेश में 28 मार्च 2021 को कट्टरपंथियों द्वारा जला दिया गया।)

1.
जो रखा था वहाँ
वह ज़रूर जल गया है
किंतु सुर शाश्वत है

वो किसी वाद्य में नहीं
प्रकृति के एकांत में बजता रहेगा

कभी उनके शिष्यों में
जो सजल-उर-शिष्य होगा
जिसने साधा होगा संगीत निर्विकार
अपने गुरु के दाय का मान रख
बजाता रहेगा वाद्य को

संगीत वाद्य में नहीं
बजाने वाले की आत्मा से निकलता है

सुर संसृति में मौजूद है
बांग्लादेश से मैहर तक
प्रकृति के अनजान शोर में
आलाप की तरह गूँजेगी

ये सौहार्द की धुन है
जो मध्य-लय में अनवरत बजती है।

2.
मैहर के
मंदिर परिसर में
जब आल्हा-ऊदल देवी को
आकर फूल चढ़ाते हैं
अशरीरी

तब राग श्री की धुन भी
सुनाई देती है

क्या कभी रोक पाओगे इसे
क्या कभी जला पाओगे
उन आस्थाओं को

जो किसी संग्रहालय में संरक्षित नहीं
आत्मा में सुरक्षित हैं?

जले हुए सरोद से भी लय निकलती रहेगी अनवरत
तुम सुन नहीं पाओगे
तुम्हारे कान बहरे हो जाएंगे

जिन्होंने नफ़रत के बोल सुने हैं
वे कहाँ सुन पाते हैं
किसी भी वाद्य से निकले संगीत को।

3.
जलाने वालों ने क्या-क्या नहीं जलाया है अब तक
लेकिन वे नहीं जान पाए कभी
जो राख से जन्मता है

उनमें सिर्फ कोमलता नहीं
उस आग की ताप भी होती है

शीत-ताप
जो बरसो-बरस तपाती रहती है
समूची मानवता को।

4.
किसी इतिहास में दर्ज हो जायेगा
एक सरोद जो जल गया

लेकिन क्या कोई वर्तमान
कभी रोक पायेगा
उसके संगीत को

जो साक्षात नाद-ब्रह्म है
शाश्वत और अविनाशी

अगर उससे प्रेम का संगीत निकल सकता है
तो ताण्डव के धुन भी व्याप्त है उसमें

चुनाव आपका है कि
आप लास्य चुनते हैं कि ताण्डव।

5.
कला प्रेमी चुप हैं
लेखनी निर्वाक

जब किताबें जलती रहीं
नीरो वंशी बजा रहा था

आज जब वंशी जल रही है
और कुछ लोग चुप हैं
अपने डर में वे चैन की वंशी बजा रहे हैं

यह जलने-जलाने का क्रम अनवरत चलता रहेगा

तय आपको करना है कि
जिस दिन
जलने-जलाने का सिलसिला आप तक आयेगा

आपके घरों पर पानी डालने के लिए कोई नहीं होगा
कोई भी नहीं।

6.
जो जल गया
वह तो जल गया

जिसने जलाया
वह जीवन भर उसके आंच में दहेगा

जो जलते हुए को देख
तमाशबीन बने रहे
उनका कोई इतिहास नहीं होगा।

7.
वे बहुत डरे हुए लोग हैं
मुट्ठी भर लोग हैं
जो सिर्फ जलाना जानते हैं

वे बहरे लोग हैं
मुट्ठी भर लोग हैं
जो सिर्फ अपनी बात सुनाना जानते हैं

वे वाचाल लोग हैं
मुट्ठी भर लोग हैं
जो सिर्फ भड़काना जानते हैं

वे कायर लोग हैं
मुट्ठी भर लोग हैं
जो सिर्फ डराना जानते हैं

और हम सोए हुए लोग हैं
जो मुट्ठी भर लोगों से
डर जाते हैं।

8.
कहीं सरोद जलता है
कहीं सितार जलता है
कहीं किताबें जलती हैं
कहीं दिल जलते हैं

क्या कोई मरियम का पुत्र नहीं है यहाँ
जो जले पर मरहम लगाए।

नैनीताल : कुछ दृश्य

1.
झील में एक नाव
चुपचाप
ठहरी हुई
खेवय्या गुम है
किसी सोच में
या तुम्हारे प्रेम के फरेब में।

2.
पहाड़ का सबसे निचला पत्थर
मुलायम हुआ है
मुझे पानी पर
भरोसा है
वह पहाड़ को थाम लेगा।

3.
लाल टीन की छत
बुरांश का सूखा फूल
और एक पत्ता
टूट कर गिरने को है

जैसे प्रेम का पत्ता हो।

4.
दूर पहाड़ की ऊँचाई
पर
एक तारा टिमटिमाता है

जैसे जीवन के पहाड़ पर
तुम्हारी याद झिलमिलाती है।

5.
पानी में
पहाड़ का प्रतिबिंब है

वैसे ही जैसे
मेरे जीवन में तुम्हारा अस्तित्व है।

6.
पहाड़ के पीछे
जंगलों में आग लगी है

धुएँ ने आकाश को धुंधला कर दिया है

पहाड़ देश है
देश से उठते धुएँ ने
नागरिकों का देखना दूभर कर दिया है।

6.
सौंदर्य मोहित कर सकता है
करता भी है
गर नज़र हो

अगर भींगते पहाड़ देखो
तो
पानी के शक्ल में
पत्थरों से खून रिसता दिखेगा

वैसे ही जैसे देखना चाहो तो
किसान का पसीना नहीं
पसीने सी शक्ल में उसका खून दिखता हो जैसे

पहाड़ का सौंदर्य
पेड़ों से है या उफान मारती पहाड़ी नदी से
जिसे हम नदी समझते हैं
वह क्या पहाड़ से निकली,
विशाल, रक्त का सोता नहीं है?

पहाड़ पर सूर्योदय और सूर्यास्त
देखते आगंतुक आँखों में
पहाड़ देखने का
औत्सुक्य तो है
लेकिन क्या वे आँखें पहाड़ की आग को
और पहाड़ से उठते धुँए को भी
अपनी सौंदर्य-भेदी नज़र से
देख पाती हैं?

पहाड़! बताओ न, तुम्हारा मर्म क्या है?

•••

कुमार मंगलम शोधार्थी व कवि हैं। उनसे mangalam1509@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।

About the author

इन्द्रधनुष

जब समय और समाज इस तरह होते जाएँ, जैसे अभी हैं तो साहित्य ज़रूरी दवा है. इंद्रधनुष इस विस्तृत मरुस्थल में थोड़ी जगह हरी कर पाए, बचा पाए, नई बना पाए, इतनी ही आकांक्षा है.

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