इनका यही डर हमारी जीत है

कविताएँ ::
सूर्यस्नात त्रिपाठी

1.

मेरे शरीर को पिघलाकर
तुम बनाना चाहते हो
एक मौन और निस्प्रभ आकाश—
स्मारक उस सुबह का
जो मैंने देखा ही नहीं।

परंतु मैं चाहता हूँ, मेरे अवर्त्तमान में
मेरे अवयव किसी नादान बच्चे का
खिलौना बन जाएं, मेरी आँखें किसी
के लिए दर्पण बनें, मेरी अस्थियाँ वंशी
बन जाएं, और मेरी छाती पर लेट कर
तितलियाँ थकान मिटाएं।

अपनी संकीर्णता में बंदी तुम क्या जानो,
मैं जब पिघलूंगा
शीतल चांदनी की नदी बन जाऊंगा।

2.

रतजगी आँखों से उतार कर
तुम ने फेंक दिया जिसे,
वही मेरी सुबह है।

तुम एक रात की उम्र मेरे सीने पर,
और यह सुबह,
यह हमारी मृत्यु का इश्तहार

तुम्हारे लौट जाने पर यह शोर कैसा?
तुम्हारे आने पर तो सन्नाटा सा था
वह सन्नाटा याद है मुझे,
और याद है वह चांद भी,
जो एक दाग़ था आसमान की
हथेली पर

तुम्हारा लौट जाना, किसी एकांत
की प्रस्तावना है।

और अनंत काल से
एकांत ही तो नियति है प्रेम की
रिश्तों की, जीवन की

तुम मेरे लिए
वही आदिम एकांत हो।
तुम ही से शुरू होती है
सारी शुन्यता मेरी।

3.

जब भी कहीं पर विरोध का स्वर
गूंजता है, तब कुछ और आवाजों
को बुलंद कर दिया जाता है।

ये आवाजें, खरीदे हुए जयघोष की होती हैं
और ये सिर्फ शोर हैं,
इनकी आत्मा मर चुकी है।

यह शोर एक साथ गरजती हुईं
उन हजारों मशीनगनों का है,
जिन्हें शांति की चिड़िया का चहचहाना
पसंद नहीं।

यह शोर, अँधी मधुमक्खियों के उस झुंड का है,
जो फूलों को कुचलता हुआ आगे बढ़ रहा है

यह शोर, पानी के उन तीरों का है,
जिन्हें खून से लिपटी हुई ख़ाक में जा गिरना है

लेकिन यह शोर, ये आवाजें, यह छल,
ये सब, विरोध के स्वर को मिटा नहीं सकते
इन्हें इन्हीं के डर ने जकड़ रक्खा है।

ये डरते हैं थरथराती हुई उस लौ से,
जो अकेली ही आंधी से लड़ जाती है

ये डरते हैं, उस जिद्दी पतंग से,
जो हथेली पर रफू किए हुए
स्वाभिमान ले कर
आग की लपटों से टकराता है

ये डरते हैं, उन मेहनतकश लोगों से,
जो हर बार बाढ़ के बाद रेत के घर बनाने से बाज नहीं आते

ये डरते हैं, उस भीड़ से, जो सदियों से
अपनी स्वेद से मिट्टी की सिंचाई कर रही है,
जिसने इस धरती के सीने में विरोध के बीज
बो रखे हैं

और इनका यही डर, हमारी जीत है।

•••

सूर्यस्नात त्रिपाठी उड़िया के चर्चित युवा कवियों में से हैं। उन्होंने हिंदी में भी कविताएँ और नाटक लिखे हैं। उन्होंने धर्मवीर भारती की ‘कनुप्रिया’ का हिंदी में अनुवाद किया है और वे युवा साहित्य अकादमी पुरस्कार (ओड़िया) से सम्मानित हैं। उनसे suryasnata@iiitsurat.ac.in पर बात हो सकती है।

About the author

इन्द्रधनुष

जब समय और समाज इस तरह होते जाएँ, जैसे अभी हैं तो साहित्य ज़रूरी दवा है. इंद्रधनुष इस विस्तृत मरुस्थल में थोड़ी जगह हरी कर पाए, बचा पाए, नई बना पाए, इतनी ही आकांक्षा है.

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