खुद को पहचान पाना मुश्किल हो जाता है !

कविताएँ ::
आदित्य प्रकाश वर्मा

आदित्य प्रकाश वर्मा

 चाँद पर कविता

कवि ने लिखी चाँद पर कितनी कविताएं,
जब भी कवि और चाँद नजर मिलाते थे,
पर अब,
कविताएं नहीं है,
उनकी नजर मिलती है,
पर कविताएं नहीं हैं.

चाँद ने भी,
बादलों की चादर ओढ ली है,
इतनी कि कवि दिखाई न पड़े,
पर चाँद की चांदनी कवि से दूर नहीं.

वो बैठा है पीपल के नीचे,
जिसके फल, पत्तियाँ और टहनियाँ
ले गया एक लकड़हारा.

कवि अपनी कमर लगाए पेड़ के तने से,
अब झरने को देख रहा है,
शायद इसलिए,

क्योकि उसमें भी,
वो शीतलता है,
वो चमक है,
चाँद की परछाई है,
पर,
कविताएं नहीं है.

कवि
उन पत्थरों को भी निहार रहा है,
पर
वो मायूस है
कि उनमें वो दाग नहीं है,
कविताएं नहीं है.

नयी बेलों ने,
कवि को उस पेड़ के तने से बाँध दिया है
और कवि की कलम रुक रही है.
अब फर्क नहीं पड़ता,
चाँद और कवि की नजरें मिलती है,
पर…. कविताएँ नहीं हैं.

कवि जीने की कोशिश में जुट गया है,
बरसात का इंतजार है.

आसान नहीं होता

आसान नहीं होता,
खुद को
समेट पाना एक ताबूत में.

काट-छाँट कर कुछ हिस्से,
बड़े टुकड़े,
निकालने पड़ते हैं.

मन कहीं नहीं समाता,
इसलिए एक अलग चिता बनाई जाती है उसकी.

हथोड़े चलाने पड़ते हैं
करके सख्त दिल.

फिर निकाल फेंकना पड़ता है
वो दिल भी.
उस ताबूत में दिल की कोई जगह नहीं होती.

खुद को पहचान पाना मुश्किल हो जाता है !

ऐसे ही अब घूमते हैं लाखों
ताबूतों में,
जिन पर गढ़ दिया जाता है उनका नाम.

क्यों ना उन ताबूतों को
मन की चिता पर रख जला दें?

क्यों?
मेरा दम घुटता है उनमें.

कविता की याद में

‘कविता की याद में’
जब खो देते हैं,
वो लिखते हैं.

कवि ऐसे ही होते है.

किसी की याद में,
अधूरे ख्वाब में,
उसे पाने,
वापस खींच लाने की चाह में,
लिख देते हैं,
एक कविता.

बनाने में तस्वीर
जाने वाले की,
कई रातें जाती है.

दिन बड़े मंदे कटते हैं,
ज़िन्दगी लम्बी लगती है,
एक मात्र धर्म रह जाता है,
कविता.

मज़ार, मंदिर बनाये जाते हैं,
साधना की जाती है,
कविता और उसके विषय की,
की जाती है मंगल भविष्य की कामना.

कवि हम्बर्ट हम्बर्ट भी लिखते है,
लोलिता की याद में,
कोसते है क्विलटी को.

कवि होना आसान नहीं,
ना, कविता की याद में जीना

तारीख

जाने की तारीख
आने की तारीख
को तय हुई

बीच में
जो भी जिया,
तुम्हारा मेरा इतिहास है
जिस पर कोई किताबे नहीं होंगी.

…….

आदित्य दिल्ली में रहते हैं और पेशे से विज्ञान के अध्यापक हैं, साथ ही लिखने और पढ़ने में गहरी रूचि रखते हैं. उनसे theadipicasso@gmail.com पर बात की जा सकती है.

About the author

इन्द्रधनुष

जब समय और समाज इस तरह होते जाएँ, जैसे अभी हैं तो साहित्य ज़रूरी दवा है. इंद्रधनुष इस विस्तृत मरुस्थल में थोड़ी जगह हरी कर पाए, बचा पाए, नई बना पाए, इतनी ही आकांक्षा है.

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