बर्बरों का इंतज़ार 

कविता ::
कोंस्टेंटीन पी. कवाफ़ी
अनुवाद और प्रस्तुति : अंचित

कोंस्टेंटीन पी. कवाफ़ी | छवि साभार : the Paris Review

।। बर्बरों का इंतज़ार ।।

यहाँ बैठक में इस तरह जमा होकर हम लोग

क्या कर रहे हैं?
आज बर्बर आने वाले हैं.

आज संसद में कुछ हो क्यों नहीं रहा?
आज सांसद बिना चर्चा के क्यों बैठे हैं?

क्योंकि आज बर्बर आने वाले हैं
अब सांसद क़ानून बना कर क्या करेंगे?
एक बार बर्बर आ गए तो क़ानून वही बनाएँगे.

आज हमारा राजा जल्दी क्यों उठ गया
और वह क्यों अपने सिर पर मुकुट लगाए
शहर के मुख्य द्वार पर बैठा हुआ है?

क्योंकि आज बर्बर आने वाले हैं
और राजा उनके नेता का इंतज़ार कर रहा है
उसके पास एक काग़ज़ है जिसमें उसने
भारी-भरकम उपाधियाँ नेता के लिए लिख रखी हैं .

आज क्यों पुजारी, गायक अपने सुंदर और कढ़ाई किए हुए
वस्त्रों में बाहर आए हैं?
आज क्यों उन्होंने अपने हाथों में बिल्लौरे-पन्ने जड़े हुए कड़े पहने हुए हैं?
आज क्यों उन्होंने सोने-चाँदी से बनी हुई छड़ी अपने हाथ में ली हुई है?

क्योंकि आज बर्बर आने वाले हैं
और वो सवालों और बहसों से ऊब गए हैं.

ये अचानक आश्चर्य कैसा? ये भ्रम कैसा?
(लोगों के चेहरे कितने गम्भीर हो गए हैं.)
चौराहे और गालियाँ अचानक ख़ाली क्यों होने लगी हैं
और सोच में डूबे लोग घर क्यों जा रहे हैं?

क्योंकि रात हो गयी है और बर्बर आए नहीं.
और सीमाओं पर तैनात हमारे कुछ लोग कहते हैं
कि बर्बर अब होते ही नहीं.

तो अब बिना बर्बरों के हमारा क्या होगा?
ये लोग ही तो हमारी समस्याओं का समाधान थे.

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कवाफ़ी महत्वपूर्ण ग्रीक कवि हैं. उन्होंने शहरों, लोगों और समलैंगिक-प्रेम के बारे में  कई कविताएँ लिखीं हैं. वे ताउम्र एक बंदरगाह पर क्लर्क का काम करते रहे और अपने जीवन में अपनी कविताएँ छपवाने से बचते रहे. किसी के कहने पर खुद ही अपनी कविताएँ लिखकर या छपवा कर दे दिया करते थे. अंचित से anchitthepoet@gmail.com पर बात हो सकती है.

About the author

इन्द्रधनुष

जब समय और समाज इस तरह होते जाएँ, जैसे अभी हैं तो साहित्य ज़रूरी दवा है. इंद्रधनुष इस विस्तृत मरुस्थल में थोड़ी जगह हरी कर पाए, बचा पाए, नई बना पाए, इतनी ही आकांक्षा है.

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