Tagकविता-भित्ति

प्रेम

कविता-भित्ति :: प्रेम : ठाकुर गोपालशरण सिंह ठाकुर गोपालशरण सिंह (01 जनवरी 1891 – 02 अक्तूबर 1960) का जन्म रीवा, मध्य प्रदेश में हुआ था। उनकी गणना द्विवेदी युग के प्रतिनिधि कवियों में की जाती है। मानवी (1938), माधवी (1938), ज्योतिष्मती (1938), संचिता (1939), सुमना(1941), सागरिका(1944), ग्रामिका (1951) आदि उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं। इसके अतिरिक्त उन्होंने कुछ प्रबंध-काव्यों की भी रचना की, जैसे...

घनाह्लाद

कविता-भित्ति :: घनाह्लाद : सियाराम शरण गुप्त सियारामशरण गुप्त (जन्म: 4 सितंबर, 1895; मृत्यु: 29 मार्च, 1963) का जन्म ग्राम चिरगाँव में हुआ, जो उत्तर प्रदेश के झाँसी जिले में है। वह हिन्दी के प्रसिद्ध साहित्यकार और राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त के छोटे भाई थे। गाँधीवादी विचार से अत्यंत प्रभावित होने से उनकी रचनाओं में करुणा, सत्य और अहिंसा की मार्मिक अभिव्यक्ति  मिलती है। हिन्दी साहित्य में उन्हें एक...

शुद्ध प्रेम ही सार है

कविता-भित्ति :: ‘सज्जन’ और ‘प्रेम’ : रामनरेश त्रिपाठी रामनरेश त्रिपाठी (4 मार्च, 1889 – 16 जनवरी, 1962) का जन्म उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले के ग्राम कोइरीपुर के एक कृषक परिवार में हुुुआ। पं. त्रिपाठी ने अपनी प्रारम्भिक शिक्षा गांव के प्राइमरी स्कूल में ग्रहण की। ‘पूर्व छायावाद युग’ के इस कवि ने कविता, कहानी, उपन्यास, और जीवनी के साथ ही संस्मरण और बाल...

सागर के उस पार

कविता-भित्ति :: सागर के उस पार : गयाप्रसाद शुक्ल ‘सनेही’ गयाप्रसाद शुक्ल ‘सनेही (१८८३-१९७२) का जन्म उत्तर प्रदेश राज्य के उन्नाव जिले के हडहा गाँव में हुआ था। इन्होंने प्रारंभिक शिक्षा के दौरान ही हिंदी, उर्दू और फ़ारसी का ज्ञान प्राप्त किया और  शुरुआत में ब्रजभाषा और फिर उर्दू में सुंदर रचनाएँ लिखने के बाद कालांतर में खड़ी बोली में कविताएँ लिखीं। इनकी शुरुआती कविताओं में...

कर्मवीर

कविता-भित्ति :: कर्मवीर : अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ (15 अप्रैल, 1865 – 16 मार्च, 1947) हिंदी काव्य-संसार के सुप्रतिष्ठित हस्ताक्षर हैं। निजामाबाद जिला- आजमगढ़ (उत्तरप्रदेश) के निवासी हरिऔध आरंभ में ब्रजभाषा में कविताएँ लिखते थे और बाद में खड़ी बोली में रचने लगे। उनकी गणना द्विवेदी युग के प्रतिनिधि कवियों में की जाती है। ‘प्रिय प्रवास’ उनकी अत्यंत...

कितनी मौलिक जीवन की द्युति

कविता-भित्ति :: माखनलाल चतुर्वेदी की कविता: ‘कितनी मौलिक जीवन की द्युति’ माखनलाल चतुर्वेदी (४ अप्रैल १८८९-३० जनवरी १९६८) का जन्म मध्य प्रदेश के होशंगाबाद जिले में बाबई नामक स्थान पर हुआ था। वे ओजस्वी भाषा के कवि, लेखक और प्रतिष्ठित पत्रकार थे। स्वतंत्रता संग्राम के समय अत्यंत सक्रिय रहते हुए उन्होंने ‘प्रभा’ और ‘कर्मवीर’ पत्रों का संपादक अत्यंत प्रभावी रूप से...

सखि, वसन्त-से कहाँ गये वे

कविता-भित्ति :: मैथिलीशरण गुप्त की यशोधरा से एक काव्य-खंड सखि, वसन्त-से कहाँ गये वे, मैं उष्मा-सी यहाँ रही। मैंने ही क्या सहा, सभी ने मेरी, बाधा-व्यथा सही। तप मेरे मोहन का उद्धव धूल उड़ाता आया, हा! विभूति रमाने का भी मैंने योग न पाया। सूखा कण्ठ, पसीना छूटा, मृगतृष्णा की माया, झुलसी दृष्टि, अंधेरा दीखा, दूर गयी वह छाया। मेरा ताप और तप उनका, जलती है हा! जठर मही, मैंने ही क्या सहा, सभी ने मेरी, बाधा...

सुंदर भारत : श्रीधर पाठक

कविता-भित्ति :: श्रीधर पाठक की कविता सुंदर भारत सुंदर भारत 1. भारत हमारा कैसा सुंदर सुहा रहा है शुचि भाल पै हिमाचल, चरणों पै सिंधु-अंचल उर पर विशाल-सरिता-सित-हीर-हार-चंचल मणि-बद्धनील-नभ का विस्तीर्ण-पट अचंचल सारा सुदृश्य-वैभव मन को लुभा रहा है भारत हमारा कैसा सुंदर सुहा रहा है 2. उपवन-सघन-वनालि, सुखमा-सदन, सुखाली प्रावृट के सांद्र धन की शोभा निपट निराली कमनीय-दर्शनीया कृषि-कर्म की प्रणाली सुर-लोक...

विश्व बोध

कविता-भित्ति :: मुकुटधर पांडेय की कविता विश्व बोध विश्व बोध खोज में हुआ वृथा हैरान, यहाँ ही था तू हे भगवान! गीता ने गुरु ज्ञान बखानाद्ध वेद-पुराण जन्म भर छाना, दर्शन पढ़े, हुआ दीवानाद्ध मिटा नहीं अज्ञान। जोगी बन सिर जटा बढ़ाया; द्वार-द्वार जा अलख जगाया; जंगल में बहुकाल बिताया हुआ न तो भी ज्ञान। ऊषा-संग मंदिर में आया; कर पूजा-विधि ध्यान लगाया; पर तेरा कुछ पता न पाया; हुआ दिवस अवसान। अस्ताचल पर...