घनाह्लाद

कविता-भित्ति ::
घनाह्लाद : सियाराम शरण गुप्त

सियारामशरण गुप्त (जन्म: 4 सितंबर, 1895; मृत्यु: 29 मार्च, 1963) का जन्म ग्राम चिरगाँव में हुआ, जो उत्तर प्रदेश के झाँसी जिले में है। वह हिन्दी के प्रसिद्ध साहित्यकार और राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त के छोटे भाई थे। गाँधीवादी विचार से अत्यंत प्रभावित होने से उनकी रचनाओं में करुणा, सत्य और अहिंसा की मार्मिक अभिव्यक्ति 
मिलती है। हिन्दी साहित्य में उन्हें एक सशक्त कवि के रुप में तो लोग जानते ही हैं, उसके साथ ही उन्होंने एक यशस्वी कथाकार के रूप में भी साहित्य में अपना स्थान बनाया। उनकी रचनाओं में सौम्यता और सरलता साफ़ झलकती है। उनकी काव्य रचनाओं में शामिल है – ‘मौर्य विजय’, ‘अनाथ’, ‘आर्द्रा’, ‘विषाद’, ‘दूर्वा दल’, ‘आत्मोत्सर्ग’, ‘पाथेय’, ‘मृण्मयी’, ‘बापू’, ‘उन्मुक्त’, ‘सुनन्दा’ और ‘गोपिका’ आदि। उनकी रचनाशीलता का विस्तार उनके अनुवाद-कार्य, निबंध, नाटक और कहानियों में भी भलीभाँति दिखाई देता है।

प्रस्तुत कविता में कवि वर्षा की सुंदर और सघन व्याख्या करते हुए वसुधा पर उसके प्रभाव की बात करते हैं। कवि प्रकृति के आनन्द और उसके सौंदर्य की विवेचना करते हुए पद्य का अंत अपने मन के विषाद से करते हैं, जो घोर वर्षा के बीच उनके मन को व्यथित करता है। एक तरह से इस विषाद का कारण पाठकों के लिए रहस्य-बिंदु बन जाता है, यह सोचने का विषय कि कवि का मन भावों में किस तरह डूबा हुआ है। इस रचना से कवि की सूक्ष्म कला-दृष्टि और उनकी रचनात्मक-शैली का भी भान होता है।

— सं.

सियाराम शरण गुप्त

घनाह्लाद

पावस का यह घनघटापुंज
कर स्निग्ध धरा का नव निकुंज
बरसा बरसा कर सुरसधार
करता है नभतल में विहार।

भरकर नव मौक्तिकबिन्दु माल
वसुधा का यह अंचल विशाल
आनंद विकम्पित है अधीर;
क्रीड़ारत है सुरभित समीर।

नव-सूर्य-करोज्ज्वल, रजतगात,
झरझर कर यह निर्झर प्रपात
कर उथलित प्रचुर प्रमोदपान
करता है कलकल-कलित गान।

रह रह कर यह पिक बार-बार
कर रहा मधुरिमा का प्रसार
है हरित धरा का हेमगात्र
भर ओतप्रोत प्रमोदपात्र।

उस प्रमद पात्र का सुरस धन्य
है छलक रहा अनुपम अन्य।
पर इस उर में यह घनाह्लाद
धारण कर लेता है विषाद।

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इन्द्रधनुष पर प्रकाशित स्तम्भ ‘कविता-भित्ति’ के अंतर्गत अपनी भाषा की सुदीर्घ और सुसम्पन्न काव्य-परम्परा से संवाद और स्मरण करने के उद्देश्य से हम प्रत्येक सप्ताह इस स्तम्भ के तहत अपनी भाषा के एक महत्वपूर्ण हस्ताक्षर की किसी रचना का पाठ और पुनरावलोकन करते हैं। इस स्तम्भ में प्रकाशित कृतियों को देखने के लिए देखें : कविता-भित्ति

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इन्द्रधनुष

जब समय और समाज इस तरह होते जाएँ, जैसे अभी हैं तो साहित्य ज़रूरी दवा है. इंद्रधनुष इस विस्तृत मरुस्थल में थोड़ी जगह हरी कर पाए, बचा पाए, नई बना पाए, इतनी ही आकांक्षा है.

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