अल्पमत के पक्ष में खड़ीं कविताएँ

समीक्षा ::
अरुण श्री

“डरा नहीं हूँ मैं
हजारों अस्वीकारों से बनी है मेरी काया

हजारों बदरंग कूंचियों ने बनायी हैं मेरी तस्वीर
हजारों कलमों ने लिखी है एक नज़्म जिसका उनवान है मुस्कराहट
और वे मेरी मुस्कुराहटें नहीं छीन सकते”

संकलन की प्रतिनिधि कविता में कवि की यह घोषणा पढ़ते हुए यह अनुमान हो जाता है कि कवि कितने ताप दाब  के बाद यह आकार पा सका होगा। ताप और दाब से तात्पर्य यह नहीं कि उसे पिघलाकर साँचे में ढाल दिया गया है, बल्कि यह है कि कवि ने अपनी जीवन-जगत यात्रा में मिले प्रहारों से एक अनगढ़ कठोरता और अनियंत्रित नुकीलापन अर्जित किया है और पाठकों को चोटिल करने की यह प्रवृति ही इन कविताओं का वास्तविक सौंदर्य है।

यह कविता संग्रह अस्वीकार से बनी कवि की कठोर और नुकीली काया का कायिक प्रवर्धन है। यहाँ कवि प्रयोगशाला में संवर्धित गुरुवत उपदेश नहीं देता अपितु सांसारिक स्थूलता को जस का तस प्रस्तुत कर देने के बाद भी सूक्ष्म अनुभूतियों का अगोचर विस्तार रच देता है। ये कविताएँ स्थूल व् सूक्ष्म  के बीच का अंतर्संबंध रेखांकित करती हुई अपनी उपस्थिति दर्ज कराती हैं। राजेश कमल का कविस्व-संविद् होकर अपने चित्त का प्रसार वस्तु-जगत तक करता है और प्रकाशित का विमर्श रचता है। प्रकाश और विमर्श की यह युति इतनी सहज और प्रभावशाली है कि सहृदय वर्ग-मित्रों को कवि ह्रदयमें बदल देती है। क्रिया की यही कुशलता तो कला है।

कवि का नुकीलापन कहीं-कहीं अनियंत्रित भी हुआ है। सभा में निषिद्ध शब्दों का कविताओं में प्रयोग यह दर्शाता है कि कवि ने अपनी कल्पना की शक्ति का उचित प्रयोग नहीं किया है बल्कि रचना के विशेष क्षण में वह क्रोध और उत्तेजना से प्रभावित है और संवाद के क्रम में यह अनायास ही घटित हुआ। हालाँकि इसे प्रयोगवादी दृष्टिकोण से सही भी ठहराया जा सकता है। व्याप्ति का निरावृत चित्रण कई बार मनोग्रंथियों का नग्न वैयक्तिक प्रदर्शन न होकर उसका प्रतिरोध भी होता है। नयी कविता ने कवियों को मनुष्यता के जटिल पक्ष को व्यक्त करने के लिए अभिव्यक्ति की बंधन-रहित स्वतंत्रता दी है लेकिन एक कलाकार को चाहिए कि वह प्राथमिक कल्पना को उसके उद्गम बिंदु पर अभिव्यक्त कर देने के स्थान पर उसके विशिष्ट  कल्पना में परिवर्तित हो जाने की प्रतीक्षा करे। यह प्रतीक्षा रचना प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा है। कवि का दायित्व अपने मनोभावों को व्यक्त कर देने के बाद समाप्त नहीं हो जाता। उसे अपने लेखन के सामाजिक प्रभाव, समकाल के मूल्यों और अवमूल्यन पर सजग दृष्टि रखनी चाहिए। ऐसे प्रयोगों को करते हुए कवि को यह ध्यान रखना चाहिए कि ऐसा हर प्रयोग अपने प्रयोग को सामाजिक स्वीकृति भी प्रदान करता है। ऐसा नहीं है कि कविता में यह प्रयोग गलत है, लेकिन प्रयोगों की पुनरावृति करते हुए यह प्रयास करना चाहिए कि ‘हार्ड लैंग्वेज’ की ‘हार्डनेस’ बची रहे, उसका उपयोग सामान्य भाषा की तरह न होने लगे। नये कवि का दायित्व, यदि मूल्य-निर्धारण न भी मानें, केवल बाह्य संसार का प्रस्तुतीकरण नहीं है बल्कि उसका पुनःसृजन भी है। इस उद्देश्य की पूर्ति बिना शब्द-चेतना का विकास किए संभव नहीं है। इसी क्रम में कुछ अन्य उदाहरण देखें तो ‘अफ़ीम’ कविता में उन्होंने लिखा है कि “दिमाग का दही कर दिया है भेन्चो / कट्टे से बजा रहा है बेन्जो”। यहाँ ‘बेन्जो’ के साथ ‘भेन्चो’ के प्रयोग का एकमात्र उद्देश्य तुकांत होकर चमत्कार उत्पन्न करना है। अतुकांत कविता में तुकांतता के प्रति ऐसा छायावादी मोह प्रदर्शित करने की कोई आवश्यकता नहीं थी। एक अन्य कविता ‘स्थगित समय में’ उन्होंने लिखा है कि “कितने दिनों तक / रोटियों का विकल्प / उँगलियों को चाटना होगा” । यहाँ भी ‘ऊँगली चाटना’ मुहावरे का प्रयोग सजगता से नहीं किया गया है। ऊँगली तब चाटी जाती है जब स्वाद ऊँगली में चिपक जाता हो। रोटी की सोंधी गंध तो ऊँगली में नहीं चिपक सकती।

कवि की रचना प्रक्रिया पर यह टिपण्णी उसकी कल्पनाशीलता और काव्य सामर्थ्य पर प्रश्नचिन्ह नहीं है। ‘वो सुबह’ कविता में दवा की दूकान में समोसे की कल्पना हो या ‘अफ़ीम’ में तोप से आलाप लेने वाले संगीतज्ञ की; कवि ने अपनी क्षमता का परिचय दे दिया है।असल में राजेश कमल की विचार पद्धति वस्तुपरक और यांत्रिक न होकर आतंरिक जीवन की मूलभूत शक्तियों और स्वाभाविक प्रवृतियों की स्वीकार्यता से परिपूर्ण है। उनकी कविताओं में संस्कार-जनित सभी गुण-दोष आसानी से रेखांकित किए जा सकते हैं क्योंकि वे प्रायोजित नहीं हैं। वे अति-मानव में विश्वास न करते हुए उसकी आलोचना करने में सक्षम हैं और साथ-साथ सहज-मानव की अनुभूतियों के सजग चितेरे भी। अपनी एक कविता ‘यूज एंड थ्रो’ में उन्होंने बड़ी सुंदरता से बदलते परिवेश और उसके प्रभाव को चित्रित किया है। वैज्ञानिक आविष्कारों ने मानव जीवन को सरल बना उनकी उत्पादन क्षमता को तो बढ़ा दिया लेकिन साथ ही सहज मानव की कलात्मकता और उसकी नैतिक चेतना का अवमूल्यन भी किया है। यूज एंड थ्रो कलम के उपयोग से लिखना तो आसान हो गया लेकिन कलम में स्याही भरने की कला विस्मृत हो गई। वैज्ञानिक अविष्कारों के साथ बर्बर उपभोग की प्रवृति बढ़ी, साथ में अपशिष्ट भी बढ़ गए और यह प्रवृति केवल वस्तुओं तक सीमित नहीं रही बल्कि कालांतर में सामाजिक अंतर्संबंध भी इससे अछूते नहीं रहे। ऐसा नहीं है कि कवि मशीनीकरण या सामाजिक विकास के किसी स्वरुप का विरोधी है। देखें तो कविता ”प्रेम” में वह बड़ी सहजता से संचार व्यवस्था की कबूतर से इंटरनेट तक की यात्रा को स्वीकार करता दिखता है।  असल में वह मानव के भावात्मक पराभाव के प्रति अपनी चिंता व्यक्त करता है।

राजेश कमल मानते है कि प्राचीन सूत्रों से समाज की नयी चुनौतियाँ हल नहीं हो सकतीं ,पुराने मूल्य जीवन की नवीन गति का मार्ग अवरुद्ध करते हैं। जीवन की नवीन जटिलताओं से निपटने के लिए वे परस्पर सामाजिक/ पारिवारिक सहयोग के आकांक्षी हैं। इसी भावना से अभिभूत वे अपनी कविता ‘गणित’ में अपने बाबूजी को विह्वलता-पूर्वक पुकारते हैं। वे करुणा से भरे कवि हैं ।अपनी कविता ‘दुःख’ में वे लिखते है कि “दुःख / अपनी पूरी उम्र जी के जाता है / ईश्वर उसे कभी अकाल मृत्यु नहीं देता”। उनका यह संवेदनात्मक ज्ञान उन्हें मौलिक बनाता है और उनकी चेतना में करुणा का संचार बनाए रखता है। वे किसी हीनयानी की भाँति दुःख को स्वीकार करते हैं और दुखों के अभाव तक पहुँचने का रास्ता खोजते हुए उस स्थिति की कल्पना करते हैं जहाँ सुख का विलोम भी सुख है। उनकी कविताओं में सूचना है और सवाल हैं, सूचनाओं का पाक्षिक विश्लेषण नहीं है। सूचना क्रांति के युग में सूचनाओं के स्तर पर किए गए घाल-मेल का विनाशकारी प्रभाव कोई रहस्य नहीं रह गया है। DIKW पिरामिड के आधारभूत अवयव के साथ की जा रही यह छेड़-छाड़ सूचना विज्ञान की समूची सरंचनाको ध्वस्त कर रही है। वस्तुतः स्थिति यह है कि सूचना क्रांति प्रोपेगैंडा क्रांति में बदल गई है। वैश्विक और स्थानिक अनुभवों का स्थान प्रायोजित सूचनाओं ने ले लिया है, इतिहास के भौतिक और अध्यात्मिक तथ्यों को मिथकीय सूचनाओं से बदला जा रहा है। ऐसे प्रतिकूल वातावरण में भी राजेश कमल की सूचनाएँ दूषित या प्रायोजित नहीं हैं। वे अपने इन्द्रियगोचर अनुभव व् पदार्थ-बोध को बिना किसी छल योजना के प्रस्तुत कर देने वाले कवि है। यह अच्छी प्रवृति है कि वे अपना आग्रह थोपते नहीं हैं बल्कि पाठकों को अपनी चेतना का विस्तार करने के लिए प्रेरित करते हैं। कवि का यह नैसर्गिक भोलापन नोकदार होने के साथ-साथ लुभावना भी लगता है। हालाँकि कहीं-कहीं यह स्वाभाविक नहीं लगता। उदहारण के लिए संग्रह की पहली ही कविता ‘घृणा’ को देखें तो यह प्रश्न उठता है कि मनुष्यता के विकास क्रम में कवि को प्रेम, ईश्वर, धर्म, जाति आदि की उत्पत्ति का अनुमान है तो घृणा के विषय में क्यों नहीं है? घृणा का प्रश्न पाठक से पूछते हुए कवि की भाषा में कोई वक्रता नहीं है बल्कि वह अपनी अनभिज्ञता प्रदर्शित करना चाहता है जबकि घृणा आधुनिक मानव की स्वाभाविक प्रवृति है। इसके प्रति अपरिचित जैसा व्यवहार करने की आवश्यकता नहीं है। क्या कवि गोडसे और हिटलर से घृणा नहीं करता ? असल में वर्ग-घृणा के माध्यम से भी व्यक्ति की पक्षधरता का निर्धारण होता है। इसे प्रदर्शित करने में संकोच नहीं करना चाहिए।

राजेश कमल किसी पंथ के प्रशिक्षित कवि नहीं है। उनकी स्पष्ट पक्षधरता मनुष्यता के पक्ष में है और अपने मनुष्य होने के श्रेष्ठता बोध से ग्रसित न होकर अतिरिक्त दायित्व निर्वहन के लिए तत्पर दिखते हैं। राजेश कमल का कवि इतना जीवट है कि वह उसकी मुस्कराहट छीनने की इच्छा रखनेवाले सत्ताधीश के सामने अस्वीकार से बनी अपनी बदरंग काया के साथ तन कर खड़ा है और इतना संवेदनशील है कि वर्षों के उदास एक स्त्री की उदासी को चीन्ह लेता है। उसकी दृष्टि इतनी तीक्ष्ण है कि लोकतंत्र के ध्वजवाहकों का राजसी व्यवहार उससे छुप नहीं सकता और इतनी सचेत है कि ईश्वर के अस्तित्व पर सवाल खड़े करती है। वह सत्य के साथ इतना आस्थावान है कि अतीत के प्रति नास्टेल्जिक न होकर यह स्वीकार करता है कि अब गाँव की कोयल भी कांव-कांव करने लगी है। आज जब बहुमत से संस्कृति को एकरंगा बना देने का प्रयास हो रहा है, कवि निडरतापूर्वक अल्पमत के पक्ष में खड़ा है और “वसुधैव कुटुम्बकम” और “अतिथि देवो भवः” का नारा लगाने वाली भीड़ के दोगलेपन को उजागर करता है और उन्हें लानत भेजता है। वह इतना हिम्मती है कि कुत्ते की मातृभाषा के समर्थन में अकेला खड़ा है।

ऐसे साहसी कवि राजेश कमल का यह पहला परिचय उनके
भविष्य के प्रति आशान्वित करता है, उन्हें शुभकामनाएँ।

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अरुण श्री कवि हैं। एक कविता संग्रह ‘मैं देव न हो सकूँगा’ वर्ष 2015 में प्रकाशित है। उनसे arunsri.adev@gmail.com पर बात हो सकती है। अरुण श्री से और परिचय तथा इंद्रधनुष पर उनके पूर्व-प्रकाशित कार्य के लिए यहाँ देखें : सारे उत्सव स्थगित

About the author

इन्द्रधनुष

जब समय और समाज इस तरह होते जाएँ, जैसे अभी हैं तो साहित्य ज़रूरी दवा है. इंद्रधनुष इस विस्तृत मरुस्थल में थोड़ी जगह हरी कर पाए, बचा पाए, नई बना पाए, इतनी ही आकांक्षा है.

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