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एक कविता और, और फिर, एक जीवन और

नए पत्ते :: कविताएँ : अविनाश भाषा की पेंचकसी बसी-बसाई क्रूरतम भाषा को मथ कर उस संगीतात्मकता का निर्माण जिसे साहित्यिक कहते फिरें— होगी यह किसी कुंजी की खुराफ़ात। उस संगीत को इस तरह बजाया गया जैसे धुन ने ही पीछे आकर बनाया हो स्वयं के लिये वह वाद्य। संगीत को हमनें खोजा है और वाद्य यंत्रों का किया है अविष्कार। भाषा को बनाते हैं कबीले और उसे कसने का जिम्मा उठाते हैं यह साहित्यिक। तुम्हें जब भी लिखनी...

 क्या प्रेम भी पतझड़ जैसा ही होता है

 

नए पत्ते :: कविताएँ : विभा परमार उदासी चूंकि सर्दियों का उदास मौसम अब जा चुका है और अपने पीछे छोड़ गया है पतझड़, जो झड़ रहा है क्षण-क्षण शायद इस क्षण-क्षण में मैं भी झड़ी जा रही हूँ उन सूखी पत्तियों की तरह जो चुपचाप झड़कर पड़ी रहती हैं पेड़ों के नीचे जिनको छूने भर से ही त्याग देती हैं वे अपना शरीर! सोचती हूँ कि क्या प्रेम भी पतझड़ जैसा ही होता है- जो धीरे धीरे झड़ने लगता है! फ़िर ख़्याल कौंधता है कि मैं भी...

राहों की लम्बाई का गणित

कविताएँ :: रूपेश चौरसिया १. प्रिय, मैं तुमसे तब बात करना चाहूंगा जब धरती स्थिर हो जाएगी, रात गहरी नींद में सोई रहेगी, हवाएँ खामोश रहेंगी, चाँद हमारी पहरेदारी करेगा कि कोई आवाज हमसे न टकरा जाए. २. पते पर पहुंचे सारे प्रेमपत्र ‘माँ देख लेगी’ कहकर जला दिए गए जैसे चोरी के सबूत जलाए जाते हैं पुलिस के डर से कि सजा होगी प्रेम चोरी से भी जघन्य अपराध है. ३. राहों की लम्बाई का गणित लिखते जाएंगे...

ऊँचाई पर अकेले रहना सबसे खतरनाक है!

कविताएँ :: पवन कुमार वैष्णव कविता माँ है कठोर से कठोर प्रहार भी सह लेता हूँ, कविताओं को लिखता नहीं जी लेता हूँ. मुझसे अधिक सहती हैं मेरी कविताएँ. मैं वह बच्चा हूँ जिसे हर सिसकी में, कविता ने माँ की तरह अपने सीने से लगाया है. यदि इंसान मुझे अपने हिस्से से निकाल दे तो..! मैं वह रंग हूँ जिसे तितलियाँ नहीं लगाना चाहती, आसमान मुुुुझे स्वीकार करे. मैं वह सुगन्ध हूँ जिसे फूल अपनाना नहीं चाहते, धरती मुझे...

कविताएँ जो मैंने तुम्हें समर्पित कीं

कविताएँ :: अभिषेक आखिरी किताब तुम्हारे ताखे पर रखी सभी किताबों के नीचे जो सबसे आखिरी किताब है न- मैं वही किताब हूँ। मुझे आज भी याद है जिस दिन तुम मुझे पूरे बाजार से ढूंढ कर लाई थी फिर उस रात तुम मुझे तीन बजे तक पढ़ती रही कुछ पन्ने भी तुमने मोड़े थे, जो तुम्हेँ बहुत पसंद आए काफी दिनों तक तो तुम मुझे कहीं छोड़कर जाती ही नहीं थी, चाहे पार्क हो, कॉलेज हो, कैफे हो या सफर हो। फिर तुम्हें एक दूसरी किताब...

चिट्ठियों में मुट्ठी भर गाँव

कविताएँ :: दीपांकर दीप मुट्ठी भर गाँव  आज फुरसत में था तो यूँ ही खोलकर बैठ गया पापा की पुरानी अटैची। पड़ी थी उसमें कितनी ही ब्लैक एंड व्हाइट पुरानी तस्वीरें जिनके बैकग्राउंड में थी कहीं दादी माँ की एक साड़ी कहीं हमारा आमों का बगीचा और कहीं कहीं तो फूस के छप्पड़ के नीचे मिट्टी का पुराना घर जिसके ओसारे पर रखी है मिट्टी तेल की एक डिबिया! और, मुझे मिलीं उस अटैची में अनगिनत चिट्ठियाँ जिन्हें माँ ने रखा...

Yes, I write!

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POEMS :: PRIYA PRIYADARSHNI Poetry My words, My poems, What do they mean to you? They exist for me. Those unfinished lines I write, The pain I feel, The wounds which might never heal! In every love song There is a declaration for someone. You don’t know If they exist or not. Always unclear. Some things which were never spoken by me, Some feelings which I don’t have words for –...

आज लौटना चाहता है कोई

युवराज सिंह की कविताएँ :: नींद, सफर और सपनों की खातिर दरवाजे के पीछे सोती है उम्मीदें किवाड़ के छेदों से झाँकती है नींदे रौशनदान पर बैठी पीली पड़ चुकी पिछली लैम्प-पोस्ट की रौशनी करती है पहरेदारी. खिड़कियाँ झाँकती हैं उसी की ओर उसके चैन से पड़े शरीर को जागने न देतीं किसी रोज रात की गोद में सोया था वो तन्हा मुसाफ़िर पूर्ण हो चुके सफर के ख्वाब देखता. अँधेरा घूमता है उसके कमरे में बड़ी हसरतों से...

मैं अनंत बसंत हूँ

चन्द्र की कविताएँ :: माँ और पिता मैंने छोटी-छोटी बातों पर चिंता करनामाँ से सीखाऔर बड़ी-बड़ी बातों पर गंभीर रहनायह पिताजी से सीखा! मैंने कपिली नदी की तरह मुस्कुरानाऔर कपिली नदी की तरह चुपचाप रोना-माँ से ही सीखा धरती की तरह सहना ! अचानक ब्रह्मपुत्र की तरह बढ़ियानाफिर कुछ दिनों मेंधीरे धीरे धीरज सेघट जानापिता जी से सीखा ! मैंने माँ से ही सीखाकिसी आदमी या किसी जीव के दुख सेदुखी होना और पिताजी से यही...

रौशनी में लिखे वाक्य

नए पत्ते:: ऋतु त्यागी की कविताएँ: ठगों की सभा और उसकी पीठ ठगों की सभा में  वह कछुए की तरह खड़ी थी  उसकी पीठ पर ठगों ने लाद दिए थे  ठगी के कारनामे सभा अपनी इस कार्यवाही के बाद स्थगित हो गई. और वह धीरे-धीरे चलकर  मुख्य मार्ग पर आ गई उसने थोड़ी देर में देखा कि सड़क के किनारे खड़े लोग  उसकी कुबड़ी पीठ पर  अपनी फूहड़ हँसी के ढेले फेंकने में मशग़ूल हो गये थे। अभी इस वक़्त अभी इस वक़्त जब हम  दरवाज़ा बंद...