मैं हर वो औरत हूँ जिसे प्यार चाहिए

न से नारी ::
कविता : कमला दास
अनुवाद एवं प्रस्तुति : स्मृति चौधरी

कमला दास का परिचय सिर्फ उनके एक नाम के आधार पर देना अधूरा रहेगा। वो माधवीकुट्टी भी थीं, और आमि भी, और अपने जीवन के अंतिम मोड़ पर, वो कमला सुरैय्या थीं, और जो भी नाम उन्होंने चुना, वो शत प्रतिशत उनका अपना था। उन्होंने अपने हर नाम को एक समान अर्थ से जोड़ा— पितृसत्ता से स्वतंत्रता। उनकी कविताएँ और कहानियाँ  हर नारी के संघर्ष का परिचय देती हैं, चाहे वो संघर्ष बाहरी हो जो हम सब की आँखों को दिखाए दे, या आंतरिक हो— एक औरत की खुद को खोजने की कोशिश और अपना अस्तित्व बनाने का संघर्ष। उन्होंने 1960 और 1970 के दशक से ही ऐसे संवाद शुरू किये जिसके बारे में बंद दरवाज़े के पीछे भी चर्चा नहीं होती थी। कमला दास कहें या कमला सुरैय्या, उन्होंने अपने हर रूप में अभीत: होकर पितृसत्ता के खिलाफ़ युद्ध छेड़ा है।

— स्मृति चौधरी

कमला दास | तस्वीर साभार : द वीक

एक परिचय

राजनीति मुझे समझ नहीं आती पर सत्ता में जो लोग हैं-
नेहरू से शुरू करते हुए, मैं उन सब के नाम
एक सप्ताह के दिनों की तरह
या साल के महीनों की तरह दोहरा सकती हूँ।

मैं भारतीय हूँ, रंग साँवला, मालाबार मेरा जन्मस्थल,
तीन भाषाएं बोलती हूँ, दो में लिखती हूँ,
और सपने देखती हूँ एक में।

वे कहते हैं, अंग्रेज़ी में मत लिखो,
तुम्हारी मातृभाषा अंग्रेजी नहीं है।
तुम सब मुझे अकेला क्यों नहीं छोड़ते?
मेरे आलोचक, दोस्त, रिश्तेदार,
तुम सब मुझे अकेला छोड़ दो।

मैं अपनी मन की भाषा बोलने से प्रतिबंधित क्यों हूँ?
मेरी ज़ुबान मेरी है— उसका हर विरूपण मेरा है,
उसकी विचित्रता भी मेरी—
सब का सब सिर्फ मेरा।

आधी अंग्रेजी और आधी भारतीय,
मेरी बोली शायद थोड़ी अजीब है,
पर ईमानदार है, उतनी ही मनुष्यता से भरी हुई
जितनी मैं हूँ।

तुम्हें दिखता नहीं है क्या?
मेरी ख़ुशी, मेरी आशा और
मेरी लालसा मेरी भाषा ही बताती है।
कौओं की कांव और शेर की दहाड़ की तरह,
यह इंसान की बोली है— मन की भाषा—
जो कहीं और नहीं, यहाँ मेरे पास है,
मन जो सुनता है, देखता है, बताता  है।

किसी तूफ़ान में सरसराते पेड़, या मानसून के गरजते बादल,
या धधकती हुई चिता की आग का बुदबुदाना—
मेरी भाषा इनकी तरह गूंगी बहरी नहीं है।

मैं बच्ची थी,
लेकिन फिर उन्होंने कहा
कि अब मैं बड़ी हो गयी हूँ,
क्यूंकि मेरा कद बढ़ गया,
मेरे हाथ पैर लम्बे हो गए,
और एकाध जगह पर बाल निकलने लगे।

मुझे नहीं पता था मुझे क्या चाहिए,
इसलिए मैंने प्यार माँगा,
और उसने एक सोलह साल की लड़की को
अपने कमरे में अंदर खींच कर दरवाज़ा बंद कर दिया।

उसने मुझे मारा नहीं,
पर मेरे म्लान स्त्रैण शरीर को बहुत  घायल महसूस हुआ।
मुझे मेरे स्तनों और गर्भ के बोझ ने कुचल दिया,
और मैं बेरहमी से सिकुड़ सी गयी।

फिर… मैंने एक शर्ट पहननी शुरू की,
अपने भाई की पैंट पहनी, बाल छोटे कटवा लिए,
और हर उस चीज़ को, जो मेरे औरत होने का प्रमाण था,
मैंने नज़रअंदाज़ किया।

उन्होंने कहा, साड़ियाँ पहनो, लड़की बनो,
पत्नी बनो। सिलाई-कढ़ाई करो, खाना बनाओ,
नौकरों से नोंक-झोंक करो।
जैसे सब हैं वैसे बनो, शामिल रहो। श्रेणीबद्ध करने वाले चिल्लाते रहे।
दीवारों पर मत चढ़ो, परदे लगी खिड़कियों से मत झांको।

तुम एमी हो, या कमला? माधवीकुट्टी ज़्यादा बेहतर रहेगा।
अब समय आ गया है, एक नाम, एक भूमिका चुनो।
अपना ढोंग बंद करो, सिजोफ्रेनिया, निम्फोमेनिया का नाटक बंद करो ।
अगर प्यार में अस्वीकार मिले तो छाती पीट कर मत रो।

मैं एक आदमी से मिली थी, उससे प्यार भी किया।
वो हर एक आदमी है जिसे एक औरत चाहिए,
जैसे मैं हर वो औरत हूँ जिसे प्यार चाहिए।
उसमें… नदियों का तीव्र वेग, मुझमें… समुद्र की अश्रांत प्रतीक्षा।

मैं सबसे पूछती हूँ— तुम कौन हो?
एक ही जवाब— ये मैं हूँ। मैं उसे हर जगह देखती हूँ,
जो खुद को इस दुनिया में बुलाता है “मैं”,
वो एक म्यान में बंद तलवार की तरह तैयार बैठा है।

वो मैं हूँ,
जो आधी रात को अजनबी शहरों के होटलों में एकांत में पीती हूँ।
मैं हंसती हूँ, प्यार करती हूँ और उसके बाद शर्मिंदा होती हूँ,
वो मैं हूँ, जो यहाँ लेटी है, अपने गले में खराश के साथ,
मौत का इंतज़ार करते हुए।

मैं पापी हूँ,
और पीर भी।
मैं प्रेयसी हूँ,
और मुझे धोखा भी दिया गया।

मेरा ऐसा कोई हर्ष नहीं
जो तुम्हारा नहीं, कोई ऐसा दर्द नहीं
जो बस मेरा। मैं भी स्वयं को कहती हूँ “मैं”।

•••

‘न से नारी’ इन्द्रधनुष पर शुरू हुआ नया स्तम्भ है। इस स्तम्भ के अंतर्गत स्त्री विमर्श के प्रमुख हस्ताक्षरों के महत्वपूर्ण लेखों, कहानियों, कविताओं में से प्रसंग, लेख, काव्यांश और उद्धरण प्रस्तुत किये जायेंगे। स्त्रियों की बात स्त्रियों के ज़रिये और उनके चयन के माध्यम से सामने आये, ध्येय यह भी है।  हमारी यह भी कोशिश रहेगी कि एक ऐसा स्पेस बन सके जहाँ संवाद और स्त्री विमर्श में विस्तार संभव हो सके। यह पूरा काम, इन्द्रधनुष के अंतर्गत काम कर रही विशिष्ट टीम “द फेनोमेनल वीमेन” के सदस्य देखेंगे।

स्मृति कवि हैं और वर्तमान में जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में अध्यनरत हैं। उनसे choudharysmriti9@gmail.com पर बात हो सकती है।

About the author

इन्द्रधनुष

जब समय और समाज इस तरह होते जाएँ, जैसे अभी हैं तो साहित्य ज़रूरी दवा है. इंद्रधनुष इस विस्तृत मरुस्थल में थोड़ी जगह हरी कर पाए, बचा पाए, नई बना पाए, इतनी ही आकांक्षा है.

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