खारे पानी के पुल!

कहानी ::
अनघ शर्मा

अनघ शर्मा

ये रात आज कुछ ज़्यादा गरम है या वो चूल्हे के एकदम पास बैठी है इसलिए उसे गर्मी कुछ ज़्यादा लग रही है वो समझ नहीं पाई. चूल्हा हालाँकि बुझ चुका था और कंडों की आंच अब गरम राख में बदल चुकी थी. उसने चूल्हे पर से हंडिया उतार कर बेले में दूध उल्टा और पैर के पास रखे आलू राख में दबा दिए, सोचा सुबह तक भुन जायेंगे तो परांठों के काम आ जायेंगे. कल फिर कॉलेज जा कर मंजू मैडम से सर खपाना है. सेशन बंद होने को है. जिन बच्चों की अटेंडेंस कम हैं उनके लिए मंजू मैडम ने साफ़ बोल दिया है कि 10 रूपये का नोटरी एफिड़ेविड जमा करेंगे तभी एग्जाम में बैठ पायेंगे. जबकि यूनिवर्सिटी से ऐसा कोई नियम नहीं आया है. आज जब कुछ गार्डियन साफ़-साफ़ मना कर गए तो वो उस पर बिफर गयीं.
“ क्या मुनेश तुम मेंटर हो और तुम्हारी क्लास से इतने कम एफिड़ेविड आये हैं?”

एफिडेविड न हुए गोल्ड बांड हो गए जिनके लिए इतनी हाय-तौबा है, उसने सोचा. उसने डरते-डरते फिर भी मंजू मैडम से अपनी छुट्टी के लिए पूछ ही लिया जिसके लिए उनके ऑफिस गयी थी वो.

“मैडम जून में शादी की डेट निकल रही है तो छुट्टियाँ अप्लाई करनी थीं.”

“जून में तो प्रैक्टिकल होंगे, डेट्स आने वाली होंगी आज कल में.”

“इसी लिए आप से अप्रूवल मांग रही हूँ.” उसने कहा.

“ह्म्म्म”, उन्होंने कुछ सोचते हुए कहा, “…जून में तो वैसे भी मैनेजमेंट तुम्हें लॉन्ग लीव्स पर भेजने की सोच रहा है उसी ड्यूरेशन में निबटा लेना शादी. और वैसे मैंने तुम्हारे डायरेक्टर को बता तो दिया था कि तुम्हें इन्फॉर्म कर दें. अगस्त में ज़रूरत हुई तो इन्फॉर्म कर के बुला लेंगे तुम्हें. वैसे भी इस सेशन तुम्हारे डिपार्टमेंट में तीन ही सेमेस्टर रहेंगे न?”

“जी” इसके अलावा उसके गले से कोई और आवाज़ नहीं निकली.”

लॉन्ग लीव्स यानि नौकरी से सीधे- सीधे न निकाल कर घुमा फिर के कहना. फंड की कमी का बहाना करके दो-तीन महीने आपको बिन तनख्वाह छुट्टी पर भेज देंगे, और इस बीच अगर यूनिवर्सिटी से कापियाँ जांचने का काम आ जाये तो आपको बुला लेंगे पर उस दौरान ये कह के आपकी तनख्वाह रोक लेंगे की इस ड्युरेशन का पैसा तो यूनिवर्सिटी दे रही है न इवैल्यूएशन का. तीन-तीन महीने कौन वापसी के आसरे पर बैठता है. स्मार्ट लोग नई नौकरी की जुगाड़ बैठा ही लेते हैं, उसे भी कल किसी न किसी को बोलना पड़ेगा कि कहीं वेकेंसी हो नज़र में तो बताये.

बेले में रखे-रखे दूध बिलकुल ठंडा हो गया था.उसने नजदीक रखे फ़ोन को देखा. ग्यारह बजने आये प्रदीप का फ़ोन नहीं आया अब तक. उसने दूध वापस बरोसी में पलटा और बरोसी आलूओं के ऊपर राख पर रख दी. वो उठी बाहर निकल आई राख को चिमटे से दुबारा चूल्हे में सरकाया और अपने कमरे की तरफ़ चल दी.

प्रदीप के बाबूजी ने उसे नौकरी में होने के कारण ही चुना था. इंजीनियर लड़के के लिए ऐसी ही लड़की की तलाश थी उन्हें पर कल को ये नौकरी न रही तो ?? थकान उसके पोरों से उतर कर आँखों में भरने लगी थी. कल उसे मंजू मैडम को एफिडेविड की फाइनल रिपोर्ट देनी है, और अब तक तेतालीस में से वो सत्रह ही इकट्ठे कर पायी थी . उस पर अभी उसे संपर्क के लिए भेजने की बात हो रही है, हालाँकि अभी तक इस काम के लिए मेल फेकल्टी ही भेजे जाते रहे हैं पर इस बार जाने उसे क्यूँ भेजा जा रहा है. कल की कल सोचेंगे कह कर उसने बत्ती बुझा दी.

जिस मुहाने पर वो खड़ी थी ,वहां से सड़क एक सीधी ढ़लान में नीचे उतरती थी. नीचे, इतनी नीचे की पाँच-सात मीटर बाद दिखनी ही बंद हो जाये. वहां खड़े हो कर उसे ऐसा लगा मानो ये सड़क नहीं कोई काली नदी हो जो हरहरा के किसी अँधेरे खंदक में गिर रही हो.चिलचिलाती धूप में, इस मई के गर्म, लू के थपेड़े खाते महीने में उसे अगले सेशन के लिए पास के शहरों में संपर्क के लिए भेजा था. संपर्क यानि अपने कॉलेज के एडमिशन फॉर्म के साथ कुछ झूठी तारीफों और स्कालरशिप के खोखले वादों को शहर दर शहर किताबों के दुकानों पर छोड़ना. इन फॉर्म्स को रखने के लिए उसे दुकानदारों को झूठा लालच देना था, मसलन अगर वो एक एडमिशन लाते हैं तो तीन हज़ार, और दो लाने पर सात हज़ार का कमीशन मिलेगा और भी कुछ इसी तरह के बोगस वादे जो कभी पूरे नहीं होंगे. बैग टाँगे-टाँगे उसके कंधे दुखने लगे थे. उसने बैग उतार पैरों के पास रखा तो कन्धों पर से किसी भारी मशीन के उतरने सी राहत पाई. यू.पी रोडवेज़ की बसें एक तो वैसे भी इतनी खटारा होती हैं कि उनमें बैठ कर समय से निकलो तो भी कहीं वक़्त पर पहुँचने की गारंटी नहीं और यहाँ तो घन्टे भर से खड़ी है वो और बस नहीं गुज़री अभी तक. घर पहुँच कर सोऊँगी बस उसने सोचा.

अगले दिन जब वो कॉलेज पहुंची तो उसकी मेज़ पर मेमो रखा हुआ था. जाने से पहले जल्दबाज़ी में वो रोज़ाना की अटेंडेंस की एग्जीक्यूटिव रिपोर्ट भेजना भूल गयी थी. रिपोर्ट भी क्या खाली कागज़ काले करने का ड्रामा है. हर दूसरे महीने तो मैनेजमेंट नयी नयी टीम्स ले आता है जिनका काम ये पता लगाना होता है की एजुकेशन का लेवल हर सेमेस्टर घट कैसे जाता है. ये टीम्स दरअसल ज्यादातर तो जोंक की शक्ल अख्तियार कर लेती हैं जिनका सारा ध्येय बस यही होता है कि टीचर्स पढाई छोड़ बाकि दोयम दर्जे के कामों में व्यस्त रहें मसलन मेन गेट पर खड़े हो कर देखना कौन सा स्टूडेंट टाई पहन कर आया है या नहीं, डेली अटेंडेंस रिपोर्ट बन कर पहुंची या नहीं, रिपोर्ट में भी ख़ाली परसेंटेज न लिखी गयी हो ग्राफ भी दिखाया गया हो. सारे दिन की माथापच्ची उठापटक के बाद वो घर जाने को निकल ही रही थी कि मेन बिल्डिंग का चपरासी सामने खड़ा था|

“मुनेश मैडम, आपको चेयरमैन साब बुला रहे हैं?”

“क्या जयबीर भैया, अब इस वक़्त सवा पांच तो बज गए. मुझे बहुत ज़रूरी काम से जाना है कहीं. जा के कह दो की डिपार्टमेंट में थी नहीं,घर चली गयीं.”

“मंजू मैडम भी वहीं हैं आपके डायरेक्टर को फ़ोन करके पूछ चुकी हैं.”

“ठीक है चलो आते हैं.” उसने लम्बी सांस छोड़ते हुए कहा.

जब वो चेयरमैन ऑफिस में पहुंची तो मंजू मैडम सामने ही बैठी हुई थीं.

“आओ मुनेश, कैसा रहा तुम्हारा संपर्क ट्रिप? कहाँ कहाँ फॉर्म्स छोड़े ?”

“जी ठीक रहा मैम . आगरा, एटा, फ़िरोज़ाबाद, मैनपुरी और इटावा कवर कर आये हैं. कई जगह से तो काफी पॉजिटिव रेस्पोंस लग रहा शॉपकीपर्स का,”

“क्लासेज कैसी रही आज?”

“जी ठीक थी मैम, पूरा स्टाफ प्रेजेंट था.”

अब तक चुपचाप बैठे चेयरमैन एकदम ही बोल पड़े.

“आपकी शिकायत आई है एकाउंट्स से.”

“मेरी सर?” उसने ऐसे पूछा जैसे उसकी गर्दन पर किसी ने चाकू रख दिया हो.

“हाँ आपकी! आपने एकाउंट्स से स्टूडेंट्स टूर के लिए तीस हज़ार रिसीव किये थे उसका बिल सबमिट नही किया अब तक.जबकि आपको उन लोगों ने कई बार इंटिमेट भी किया था.”

“ सर मुझे तो उस टूर पर जाने के लिए मना कर दिया गया था. मंजू मैम ने ही कहा था मुझे कि आप नहीं चाहते कि मैं जाऊं.मुझे तो कहा गया था कि एग्ज़ाम्स का बहुत काम रहेगा इसलिए आप चाहते हैं कि मैं उस पेंडिंग काम को सॉर्ट आउट करूँ. इसीलिये मैम के कहने पर मैंने स्टूडेंट्स की टिकट्स की बुकिंग और अपने रिजर्वेशन के कैंसिलेशन के बाद बचे सारे पैसे और हिसाब डायरेक्टर सर को दे दिया था.सब बिल और बाकि चीज़ें उन्हीं के पास होंगी सर.”

“वो सब मुझे नहीं मालूम. नेक्स्ट वीक से आपकी लॉन्ग लीव्स प्रपोसड हैं उससे पहले सब हिसाब क्लियर कीजिये वरना आपकी सैलरी होल्ड कर दी जायेगी.”

एक बार को उसके मन में आया कि कुछ कह ही दे पर उसने चुप रहना ही बेहतर समझा.इस नौकरी ने उसे इतना तो समझा ही दिया है कि प्राइवेट कॉलेज के टीचर्स को ज़ब्त करने की ताक़त कुछ ज़्यादा ही रखनी पड़ती है. पर इन दिनों उसे ये ताकत बार बार घटती नज़र आती है. टुच्ची सी तन्खवाह के लिए इतना ह्यूमिलियेशन कब तक झेल पायेगी वो इनदिनों यही सब सोचा करती है.

सब की सैलरी आ गयी एक उसी की अभी तक ट्रान्सफर नहीं हुई. सुबह से दो बार एकाउंट्स भी चक्कर लगा आई वो पर एकाउंट्स वाला सक्सेना अपनी सीट ही नहीं था.

“सारा दिन कैंपस में हांडता रहता है,कभी अपनी सीट पर नहीं बैठता. अभी भी जाने कहाँ होगा उसने सोचा.”

शाम को तीसरी बार जाने पर सक्सेना मिला.

“सर मेरी सैलरी नहीं पहुंची , बाकि सब की तो आ गयी. मैं पहले भी आई थी तब आप थे नहीं. उसने कहा.”

“आपकी सैलरी तो होल्ड करा दी है.”

“किसलिए??”

“वो आप मंजू मैडम से पूछिए. हमें तो फ़ोन आया था की चेयरमैन साब कह रहे हैं कि आपकी सैलरी होल्ड रहेगी.”

“मैम, मेरी सैलरी होल्ड कर दी है एकाउंट्स ने .”

“क्यूँ?”

“सक्सेना सर कह रहे थे की आपने कहा है.”

“हां, भई वो चेयरमैन सर ने बिल देखा था जो तुमने जमा किया था. कोई आठ सौ नौ सौ का हेर फेर दिख रहा. इतना पैसा कम है. इस पैसे के अगेंस्ट कोई बिल नहीं है, इसीलिये.”

“मैम, मुझे तो भेजा भी नहीं था. ये पैसा उन लोगों ने लोकल ट्रांसपोर्ट के अगेंस्ट दिखाया है. कौन रिक्शेवाला बिल देता है! इस आठ सौ- नौ सौ के लिए मेरी सैलरी होल्ड करना तो गलत है, ये तो तंग करने वाली बात हुई.”

“सही- गलत हमें न सिखाओ मुनेश और कौन तंग कर रहा है.मैंने तो होल्ड कराई नहीं तुम्हारी सैलरी.”

“आप एग्ज़ीक्यूटिव डायरेक्टर हैं, आप कहेंगी तो रिलीज़ हो जायेगी मेरी सैलरी.”

“ये सब मेरे हाथ में नहीं है. इतना है तो जा कर चेयरमैन सर से मिलो.मैं कोई हेल्प नहीं कर सकती,”

अगली सुबह जब वो सो कर उठी तो ताऊ जी सामने आँगन में बैठे चाय पी रहे थे.

“आप कब आये ताऊ जी.”

“सुबह छ: वाली गाड़ी से.”

“इत्ती सुबह की गाड़ी से?”

“सुबह सुबह चार बजे ही प्रदीप के बाप का फ़ोन आ गया, तो तेरी ताई बोली कि अभी ही चले जाओ.”

पिताई जो अभी तक चुप बैठे थे. उसकी और मुख़ातिब हुए-

“तुम ने कल शाम प्रदीप को ये बोला था कि नौकरी छोड़ रही हो.”

“छोड़ नहीं रही, छोड़ने की सोच रही हूँ ये कहा था.”

“उसके पापा ने भाई साब को फ़ोन करके इसीलिये भेजा है.”

अच्छा, अच्छा तुम शांत रहो. मैं कर रहा न बात.

“तू क्या नौकरी छोड़ना चाह रही.कित्ती मुश्किल से मिलती हैं आजकल नौकरियां. ज़रा ऊंच-नीच में कौन छोड़ता है नौकरी.”

“कौनसी सरकारी नौकरी है ताऊ जी. बड़ी घुटन होती है मुझे वहां पर, बड़ा ह्युमिलियेशन फील होता है. मेरी पिछले महीने की सैलरी रोक दी है.”

“क्यों?”

“क्योंकि मैं एक बिल में कुछ पैसे के रिक्शे के बिल नहीं सबमिट कर पाई थी और टूर भी ऐसा जिस पर मुझे भेजा ही नहीं गया था.”

“चल मैं चलूँ कल तेरे साथ. सब को देखूं” ताऊ जी एकदम ही जोश में आ गये.

“ उससे कुछ नहीं होगा. पूरे कुएं में ही भांग पड़ गयी है ताऊ जी. जो-जो भी पी रहा है पानी बौरा रहा है. यूनिवर्सिटी से ले कर कॉलेजेस तक सब ही इस पानी का सेवन कर रहे. यूनिवर्सिटी कहती है कि पिचहत्तर परसेंट अटेंडेंस होनी चाहिए. कॉलेजेस लेट आने पर बच्चों को भगा देते हैं, गेट्स बंद कर देते हैं. जिसका पहला लेक्चर छूटा उसे बाक़ी के लेक्चर्स छोड़ने के लिए बाध्य कर दिया जाता है. उसके बाद शुरू होता है अटेंडेंस, एडमिट कार्ड का खेल जिसके लिए दस-दस रूपये के नोटरी किये ऐफिड़ेविड मांगे जाते हैं. ये जान कर भी कि ये नोटरी किया कागज़ विधि सम्मत हो जाता है, सरकारी कागज़ बन जाता है.पर इन कॉलेजों में ये चाट खाने के लिए मंगाए जाते हैं. कोई पूछ सकता है मैनेजमेंट से किस आधार पर एक लीगल डॉक्यूमेंट मंगाया जा रहा है और उसका फ़ॉलोअप क्या है. स्टाफ के नाम टीचर्स की आधी-चौथाई संख्या रखी जाएगी और फिर उसे भी पढाई से इतर क्लेरिकल कामों में उलझा देंगे. लाइब्रेरी जानबूझ कर आधे दिन खोली जाती है ताकि लेट सबमिशन के नाम पर लाइब्रेरी फाइन उगाहा जा सके. ऐसे ऐसे विषय सिलेबस में जोड़ देते हैं जिनका असल कोर्स से कोसों तक कोई वास्ता नहीं, फिर इन सब्जेक्ट्स में फेल कर के साल साल भर डिग्री रोके रहेंगे और स्टूडेंट का स्टेटस क्लियर नहीं होगा. जानते हैं ताउजी, ये नेक्सेक्स है पूरा. ऐसे करके ये लोगों को नौकरी के लिए अप्लाई न कर पाने योग्य बना देते हैं. ऐसा करके ये मार्किट में उतरने वाली मैनपॉवर की संख्या कम दिखा पाते हैं जिससे बेरोज़गारी का आंकड़ा कम दिखे. ये एजुकेशन सिस्टम ऐसा पुल है जिसके नीचे से खारा पानी बह रहा है. इस सिस्टम के खम्बों में नमक भर चुका है, ये कभी भी भरभरा के गिर जायेंगे. ये कॉलेज पीढ़ियों की पीढ़ी, एक धक्के से ग़र्क आब कर देंगे. ये सब खारे पानी के पुल हैं” वो एक सांस में ये सब कह गई.

“इत्ता पढ़ा दिया है जाईसे इतना बढ़ चढ़ के बोल रही तुम.” अम्मा बोलीं.

“ सही तो किया पढ़ा कर मुनेश की माँ, पढाई दिमाग खोलती है न की कुंद करती है.”

“और शादी भाई साब?”

अरे नहीं बनेगी बात तो न बने. कोई उमर निकली जा रही है. अकलमंद होंगे तो खुद ही समझदारी से काम लेंगे और मूर्ख हुए तो इसका दिमाग कुंद करने के थोड़े ही बियाहना है. जहाँ सुबह उठ कर ख़ुश मन से तैयार हो कर जाने का मन न करे ऐसी जगह नौकरी करने से वैसे भी पर्सनेलिटी खराब हो जाती है.अगर ये नौकरी छोड़ना चाहती है तो उसे खुद देखने दो.”

“तू अगर कल इस्तीफा देगी तो क्या तेरा पैसा मर जायेगा.”

“हाँ.”

“और नोटिस देने के बाद?”

“ तो भी जहाँ तक है, निन्यानवे परसेंट.”

“तो ये तनख्वाह?”

“चैरिटी में गयी ये तो ताऊ जी अब” वो हंस कर बोली.

“तो जा कर दे चैरिटी तू भी. अगर तुझे ग्रोथ नहीं नज़र आती तो छोड़ दे.” ताऊ जी उसके सर पर हाथ रख के बोले.

“मैं थोडा और सोने जाऊं ताऊ जी आज तो इतवार है.”

“जा सो ले और मुनेश की माँ कोई गम न करियो इस नौकरी का.पढ़े- लिखों को देर-सबेर मिल ही जाती है नौकरी. इसे भी मिलेगी और बेहतर मिलेगी. और इसकी तनख्वाह से पहले भी घर अच्छे से चल रहा था तुम्हारा तो ऐसी कोई बड़ी बात नहीं है.”

“जी भाईसाब,”

कमरे में जाते हुए वह मन ही मन इस्तीफे में लिखने वाले कारणों की लिस्ट बनाने लगी थी.

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अनघ शर्मा की ‘इन दरख्तों से खूँ टपकता है’, ‘चीनी-मिट्टी रेशम-पानी’, ‘चाँद की पेशानी पे इक दाग़ है’, आदि कहानियाँ प्रकाशित हैं. उनसे anaghsharma84@gmail.com पर बात की जा सकती है.

About the author

इन्द्रधनुष

जब समय और समाज इस तरह होते जाएँ, जैसे अभी हैं तो साहित्य ज़रूरी दवा है. इंद्रधनुष इस विस्तृत मरुस्थल में थोड़ी जगह हरी कर पाए, बचा पाए, नई बना पाए, इतनी ही आकांक्षा है.

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