स्मृतियों में होते हैं भविष्य के बीज

कविताएँ ::
श्रीविलास सिंह

श्रीविलास सिंह

हरी दूब

एक दिन जरूर
सूख जातीं हैं
होंठों पर होंठों से लिखी तमाम कविताएँ,
हरी दूब की जगह
बिछ जाती हैं
संगमरमर की कालीनें
और एक दिन जरूर
सारे प्रेमपत्र
जिंदगी के बही खातों के नीचे
दब कर खो जाते हैं।
पर फूलों का खिलना जारी रहता है
और हरसिंगार के नीचे
मोतियों का बिखरना भी सांझ ढले।

होंठो से होंठो पर लिखी ही जाएंगी फिर से
नई कविताएँ और
जिंदगी के बही खातों के नीचे से
खुशबू की तरह उड़ जाएंगे
प्रेमपत्र,
हरी दूब
उग ही आएगी एक दिन जिद कर के
संगमरमर की पट्टियों के बीच से।

स्मृतियों में

स्मृतियों में रहेंगे वे दिन
जहर घुली हवाओं वाले संवेदनहीन निर्लज्ज दिन
जब सांसों में बसी थी मौत की रक्तिम गंध और
राजनीति की चौखट पर दम तोड़ रहे थे भविष्य के सपने
जब मुरझा गए थे आशाओं की शाख के सारे फूल

जब इंसानियत से बड़े हो गये थे धर्म के पहचान चिन्ह
जब धर्म लिखा हुआ था चेहरों पर और कालिख हृदय में
जब वर्षों का प्रेम छोटा पड़ गया था दिनों की नफरत से
जब लिखी जा रही थी इतिहास और संस्कृति की नई परिभाषाएं

वे दिन जब हमारी जुबानें कलम कर दी गयीं थीं
और हमारे सपनों पर बिठा दिए गए थे बर्बर पहरे
जब संस्कृति के पहरुए थानेदारों में बदल गए थे और
जब दरबार में नाचना ही कला का परमोद्देश्य था

वे दिन जो यादों की सलीब पर लटके थे ईसा की तरह
जो बुद्ध की भांति जल रहे थे आत्म दीपक बन जाने को
‘युद्धाय कृत निश्चयः’ का घोष जब गूंज रहा था धर्मक्षेत्र में
जब सारे धर्म ग्रंथ बदल दिए गए थे युद्ध के हथियारों में

जब जुर्म था सच को सच कहना और झूठ को झूठ
जब खारिज कर दिया गया था ज्ञान और मेधा को
जब अंधकार का नाम बदल कर प्रकाश रख दिया गया था
सत्य के सारे अन्वेषकों का जब किया जा रहा था आखेट

वे दिन जब हम चल रहे थे पीड़ा के अग्निपथ पर और
सत्ता की वातानुकूलित अट्टालिकाएँ मग्न थी प्रहसन में
रेलपथ पर बिखरी हमारी रोटियाँ डूबी थी हमारे ही रक्त में
और राजपथ पर बच्चे जनने को मजबूर थी गर्भवती माएँ

स्मृतियों में रहने ही चाहिए वे दिन
क्योंकि स्मृतियों में होते हैं भविष्य के बीज
और जो भूल जाते हैं अतीत के अंधेरों को
प्रकाशविहीन होता है उनका वर्तमान।

सुलगते ही रहेंगे वे अंधेरे दिन हमारी स्मृतियों में
भविष्य का दीया बन कर।

•••

श्रीविलास सिंह सुपरिचित कवि, कथाकार और अनुवादक हैं। ‘रोशनी के मुहाने तक’ शीर्षक से उनका एक कविता-सँग्रह ‘परिंदे प्रकाशन’ से प्रकाशित है। उनसे sbsinghirs@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है। इंद्रधनुष पर उनके पूर्व प्रकाशित कार्यों के लिए यहाँ देखें : चैत का पुराना उदास गीत | मेरे लिए एक खिड़की पर्याप्त है | क्रांति उपजती है शोक के घावों से

About the author

इन्द्रधनुष

जब समय और समाज इस तरह होते जाएँ, जैसे अभी हैं तो साहित्य ज़रूरी दवा है. इंद्रधनुष इस विस्तृत मरुस्थल में थोड़ी जगह हरी कर पाए, बचा पाए, नई बना पाए, इतनी ही आकांक्षा है.

1 comment

  • उन दिनों को फिर से याद करना एक आत्म-यातना के दौर से गुजरने की तरह है।कविता उस पूरी त्रासदी को अभिव्यक्ति करती है।