कविताएँ :: स्वप्निल श्रीवास्तव प्रस्तुत कविताएँ इन्द्रधनुष को कवि सतीश नूतन की मार्फत प्राप्त हुई हैं। कवि स्वप्निल श्रीवास्तव ने उन्हें खत में लिखा है— “कभी–कभी कविता की एकरसता को भंग करने लिये इस तरह के प्रयोग की इच्छा होती…
पाठ :: प्रभात प्रणीत पहले से विकसित होती सभ्यताओं ने हमें कितने घाव दिये हैं, हमें किन-किन जगहों पर बेधा है और कितनी तरह से अक्षम, पराजित साबित किया है, क्या इसका कोई प्रामाणिक हिसाब है हमारे पास? क्या इसकी…
कविताएँ :: तनुज औदात्य फूल मुझे जब तक मिला मैं गंध को भूल चुका था भाषा तक अभी पहुंचा भी नहीं कूच कर चुके थे कालिदास असाध्य मिर्गी के दौरे हर एक प्रसव से पहले बिगाड़ देते हैं औदात्य का…
कहानी :: निशांत पचखा जेठ की सुबह कुछ ऐसी होती थी कि पूरा गाँव एकसाथ जागकर अपनी-अपनी ड्योढ़ी पर आ खड़ा होता था। पूरब दिशा में सूर्य जब तक अपनी पूरी लालिमा बिखेरता उसके पहले ही गाँव के सभी लोग…
नए पत्ते :: कविताएँ : अविनाश भाषा की पेंचकसी बसी-बसाई क्रूरतम भाषा को मथ कर उस संगीतात्मकता का निर्माण जिसे साहित्यिक कहते फिरें— होगी यह किसी कुंजी की खुराफ़ात। उस संगीत को इस तरह बजाया गया जैसे धुन ने ही…
