समीक्षा:: प्रभात मिलिंद ‘आँखें सूजी/चेहरा पानी था/वज़ूद था कि एक ज़र्बज़दा बूँद/मैंने रोने की तमाम वज़हें दी /तमाम वज़हें दी थीं बिखर जाने की/पर वह थी कि अब भी/जब्तशुदा/बहुत लाचार/ बहुत नाकाम/बदन काँपता ही रहा/सदियों से बेहिस आँधियों के थपेड़ों…
प्रतिसंसार:: पत्र : आदित्य शुक्ल [प्रियम्बदा.] ____________ सितम्बर का महीना. एक भारी बारिश का दिन. मेरे स्कूल की बस छूट गयी है. चौराहे पर बहादुर की दुकान में मैं अकेले खड़ा हूँ. एक सवाल जो बाबा ने मन में डाल…
POEM:: SHRISTI THAKUR HOME 1. They fake their eyes and leave the premises, And I search for the drops, The tears, Heaving a sigh, I unburden my soul, Falsity dwells in the holes of roads, In the wrinkles of stones,…
प्रतिसंसार:: पत्र : आदित्य शुक्ल [प्रिय प्रियंबदा.] ____________________ विदाई की भी तो एक रस्म होती है. हमारे यहाँ जब कोई स्त्री किसी रिश्तेदार के यहाँ से अपने घर को लौटती है तो एक अंजुरी चावल, हल्दी की कुछ गांठे और…
ख़त :: प्रिय पाठक मुख्य विमर्श यह है कि देश में फ़ासीवाद है. यह बात खुल कर 2018 में स्थापित हो गयी, जो ढँका छिपा था वह बार-बार सुनियोजित घटनाओं से ज़ाहिर होता रहा है. फ़ासीवाद क्यों है, यह भी…
