नए पत्ते:: कविताएँ: राज भूमि मिट्टी का घड़ा ये उस वक़्त की बात है, जब गीली मिट्टी, घड़े का आकार ले रही थी। बारिश के आगे-आगे दौड़ते हुए घर पहुंचना, किसी मैराथन से कम नहीं था। और कोयल की कूक…

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कविताएँ :: राकेश कुमार मिश्र सरकारी यूनिवर्सिटी का प्रोफेसर मैं उतना ही पढ़ता और सोचता हूँ जितना ज़रूरत हो इस ज़रूरत को पूरा करने के लिए मैं कम से कम पढ़ता और सोचता हूँ कम से कम पढ़ते और सोचते…

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कविता-भित्ति :: सुभद्राकुमारी चौहान सुभद्राकुमारी चौहान (१६ अगस्त १९०४ – १५ फरवरी १९४८) हिंदी कविता में स्थापित वह नाम है, जिनकी रचनाएँ स्वाधीनता की गुंजायमान प्रतिध्वनि पाठकों के अंतस में छोड़ जाती हैं। उनकी कविताओं को पढ़कर हम उनके रचे…

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कविताएँ :: प्रदीप्त प्रीत आमंत्रण पाँच गुना चार की खिड़की से एक भरा-पूरा आकाश खुला है औंधे मुँह पड़ी है एक कूरा मिट्टी अवसन्न भभकती हुई दुःख और संत्रास में ताप से छिटकती हुई इस मिट्टी को इंतजार है तुम्हारी…

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