कविता : रवींद्रनाथ ठाकुर बांग्ला से अनुवाद : तनुज पद्यों का एक आयुधागार जीवन की व्यस्तता और चीख के मध्य, पाषाणों में भित्तिकृत, लावण्या हो तुम– खड़ी मौन और स्थिर, अकेली और विलग महान समय बैठा हुआ है, मोहित होकर…

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कहानी  :: श्रीविलास सिंह सड़क दूर-दूर तक सुनसान थी। किसी आदमी का कहीं कोई नामो-निशान नहीं। सन्नाटा बिलकुल तने हुए तार की भांति, हल्की-सी चोट पड़ते ही चीख पड़ने को आतुर था। कहीं कोई चिड़िया, कोई जीव भी नहीं, कोई…

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कविताएँ :: विष्णु पाठक धोलावीरा के प्रतीक आषाढ़ की एक सुबह मैं करूँगा यात्रा तुम्हारी तलाश में कच्छ के रण के बीचो बीच बसे उस नगर की ओर जहाँ चाँद के डूबते सब हो जाता है श्वेत-शांत जहाँ खारा है…

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