कविता :: चार्ल्स बूकाउस्की अनुवाद एवं प्रस्तुति : अंचित बूकाउस्की फ़रिश्तों के शहर में ही हो सकते थे. उन्होंने पचास के आसपास किताबें लिखीं और उनको याद करते ही एक उज्जड़ छवि बनती है. उनको आप किसी सभागार में नहीं…

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कविता :: प्रशांत विप्लवी बोलीविया और कोस्टारिका के लोगों मैं मेराडोना हूँ आश्वस्त रहो मुझ पर विश्वास करो मैं उन तमाम देशों का भी प्रतिनिधित्व करता हूँ जिन्हें फुटबॉल खेलने से रोका जाता है जिन्हें फुटबॉल से प्यार है जिनके…

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कविताएँ :: रोमिशा आदिम गीत उसको देखते ही मोरपंखी सी लौ काँप उठी मन में ठीक वैसे ही जैसे हवा के छूते ही काँपता है कोई पत्ता और मेरी डबडबाई आँखें उसके खुले ओंठो को चूमकर गाने लगी एक गीत…

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