कविता-भित्ति :: मुकुटधर पांडेय की कविता विश्व बोध विश्व बोध खोज में हुआ वृथा हैरान, यहाँ ही था तू हे भगवान! गीता ने गुरु ज्ञान बखानाद्ध वेद-पुराण जन्म भर छाना, दर्शन पढ़े, हुआ दीवानाद्ध मिटा नहीं अज्ञान। जोगी बन सिर…

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कविता :: चार्ल्स बूकाउस्की अनुवाद एवं प्रस्तुति : अंचित बूकाउस्की फ़रिश्तों के शहर में ही हो सकते थे. उन्होंने पचास के आसपास किताबें लिखीं और उनको याद करते ही एक उज्जड़ छवि बनती है. उनको आप किसी सभागार में नहीं…

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कविता :: प्रशांत विप्लवी बोलीविया और कोस्टारिका के लोगों मैं मेराडोना हूँ आश्वस्त रहो मुझ पर विश्वास करो मैं उन तमाम देशों का भी प्रतिनिधित्व करता हूँ जिन्हें फुटबॉल खेलने से रोका जाता है जिन्हें फुटबॉल से प्यार है जिनके…

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