कविता-भित्ति :: मैथिलीशरण गुप्त की यशोधरा से एक काव्य-खंड सखि, वसन्त-से कहाँ गये वे, मैं उष्मा-सी यहाँ रही। मैंने ही क्या सहा, सभी ने मेरी, बाधा-व्यथा सही। तप मेरे मोहन का उद्धव धूल उड़ाता आया, हा! विभूति रमाने का भी…

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कविता-भित्ति :: श्रीधर पाठक की कविता सुंदर भारत सुंदर भारत 1. भारत हमारा कैसा सुंदर सुहा रहा है शुचि भाल पै हिमाचल, चरणों पै सिंधु-अंचल उर पर विशाल-सरिता-सित-हीर-हार-चंचल मणि-बद्धनील-नभ का विस्तीर्ण-पट अचंचल सारा सुदृश्य-वैभव मन को लुभा रहा है भारत…

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कविता-भित्ति :: मुकुटधर पांडेय की कविता विश्व बोध विश्व बोध खोज में हुआ वृथा हैरान, यहाँ ही था तू हे भगवान! गीता ने गुरु ज्ञान बखानाद्ध वेद-पुराण जन्म भर छाना, दर्शन पढ़े, हुआ दीवानाद्ध मिटा नहीं अज्ञान। जोगी बन सिर…

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कविता :: चार्ल्स बूकाउस्की अनुवाद एवं प्रस्तुति : अंचित बूकाउस्की फ़रिश्तों के शहर में ही हो सकते थे. उन्होंने पचास के आसपास किताबें लिखीं और उनको याद करते ही एक उज्जड़ छवि बनती है. उनको आप किसी सभागार में नहीं…

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