कविताएँ :: ज्योति शोभा निर्गुण का राग अत्यधिक दूरी है कलकत्ते से उसके शहर की इसलिए वह भेजता है मेघ , काले और घने जैसे उसके रोम है वक्षों पर. मैं यह बात साफ़ कहती हूँ उसके दूत से ,…

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समीक्षा : : प्रभात मिलिंद संदर्भ : अनिल अनलहातु का सद्य प्रकाशित कविता संग्रह ‘बाबरी मस्जिद तथा  अन्य कविताएँ‘ ..’यही कारण है कि/मेरी कविताएँ अपने/अकेलेपन के कटघरे से होकर/बूमरैंग की भाँति/वापस लौट आती हैं/अपने निभृत एकांत में/मैं जानता हूँ कि/कुछ…

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प्रतिसंसार :: आदित्य शुक्ल मूलभूत प्रस्ताव: हम सबके पास सत्य है इसीलिए किसी के पास सत्य नहीं है. जब भी कोई विमर्श शुरू होता है वह इसी मूलभूत मान्यता से अस्तित्व में आता है कि वह आपको सत्य तक पहुंचा…

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डायरी :: अज्ञेय स्वप्न : नदी में नाव में चला जा रहा हूँ. और भी यात्री हैं, एक स्त्री है, एक लड़की है, दो एक और हैं, नाविक है. नदी से हमलोग एक तीर्थ की ओर जा रहे हैं. उसका…

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