कविताएँ :: सारुल बागला शहर और तुम 1. हसरतों के शहर देखेंगे हमारी ओर अपनी प्यासी आँखों से एक प्यास हमारे जिस्म की बेचैनी नहीं देख सकती। 2. तुम आ सको तो शहर के इस कोने तक आना इस शहर…

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कविताएँ :: सूर्यस्नात त्रिपाठी 1. मेरे शरीर को पिघलाकर तुम बनाना चाहते हो एक मौन और निस्प्रभ आकाश— स्मारक उस सुबह का जो मैंने देखा ही नहीं। परंतु मैं चाहता हूँ, मेरे अवर्त्तमान में मेरे अवयव किसी नादान बच्चे का…

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कविताएँ :: अमर दलपुरा रास्ते में मिल गया था हमने नहीं कहा था अलविदा हम अलग हो चुके थे एक-दूसरे के जीवन से हम खो चुके थे धूल कणों की तरह हम नहीं बता पाए समाज और पिताओं को एक-दूसरे…

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कविता :: अमन त्रिपाठी तुम बहुत वर्षों की मेरी पृथ्वी वह— प्रकृति का सारा ‌अदृश्य और सारा दृश्य— प्रकृति-स्वरूपा! उसकी ‌कोशिकाओं का‌ बनना-टूटना फूलों का खिलना-मुरझाना उससे ‌गुजरना महाअरण्य से गुजरना उसने यानी प्रकृति ने एक बार सोचा, कि इस…

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स्त्री संसार :: उद्धरण : सिमोन द बोउवा अनुवाद, चयन एवं प्रस्तुति : स्मृति चौधरी सिमोन द बोउवा फ्रेंच अस्तित्ववादी दार्शनिक, लेखक, सामाजिक सिद्धान्तकार, और स्त्रीवादी थीं जिन्होंने बीसवीं सदी में स्त्रीवादी आंदोलन को एक नया रूप दिया। उन्होंने आधुनिक…

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