कविताएँ:: आलोक रंजन मलबा मकान बना, इश्तिहार  हुआ। घर ढहा, इश्तिहार हुआ। सादे अखबार या रंगीन स्क्रीन पर नहीं उस रद्दी पर जिसके चीथड़ों पर लिखा जा सकता है सब कुछ, फट जाने पर उनकी सटाई भी। नागरिक ढांचा है…

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मात्सुओ बाशो के कुछ हाइकु :: अनुवाद एवं प्रस्तुति : अमित तिवारी मात्सुओ बाशो (1644-94) एक महान जापानी कवि थे जो हाइकु काव्य विधा के जनक माने जाते हैं। ये एडो युग के सबसे प्रख्यात कवि रहे हैं। इनका जन्म…

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नए पत्ते:: कविताएँ : रौशन पाठक ढूँढती हूँ तुम में, तुमको। जब भी तुमसे मिलता हूँ, तुम मेरी कमीज़ पर कुछ ढूँढती हो। कुछ रेशे, कुछ धागे, उलझे सवाल और कुछ रौशनी के दाग़। दूर बैठकर निहारती हो मेरा चेहरा…

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कविताएँ :: पीयूष तिवारी ब्लैकबोर्ड उसकी स्मृतियों में अमिट पंक्तियाँ थीं लिखी जा चुकी पंक्तियों पर लिखी जा रही पंक्तियों का दुहराव था पुरातत्वविदों ने पहचानी थी उसपर उग आई काई की वज़ह से उसकी प्राचीनतम इच्छा काई, प्राचीनतम नहीं…

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कविताएँ :: सारुल बागला शहर और तुम 1. हसरतों के शहर देखेंगे हमारी ओर अपनी प्यासी आँखों से एक प्यास हमारे जिस्म की बेचैनी नहीं देख सकती। 2. तुम आ सको तो शहर के इस कोने तक आना इस शहर…

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