कविताएँ :: पुरु मालव यात्रा मेरे चलते रहने से चल रही है ये दुनिया जो मेरे रुकने से रुक जायेगी मैं पीछे मुड़ कर देखता हूँ तो निगाह दूर तक चली जाती है दूर चले गए लोग दूर से भी…

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कविताएँ :: अशोक कुमार आठवां रंग अभी-अभी एक तितली उड़ी है वह दूर दिख रहे उस इंद्रधनुष में- आठवां रंग भरना चाहती है. उसकी इस मासूम चाहना में शामिल हो गया है सूरज बादलों ने और भी बारीक कर दिये…

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कविता :: आगा शाहिद अली अनुवाद : अंचित शाहिद की माँ का इंतक़ाल अमेरिका में हुआ था. कैन्सर से. शाहिद, उनके पिता और उनके भाई बहन , अमेरिका से माँ को कश्मीर लेकर आए. शाहिद चार साल लगभग उसी तरह के…

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कहानी :: सौरभ पाण्डेय 1 मैं पेंसिल की लकीरों में छुपा हुआ पापा का पुराना चेहरा देख रहा था. अब पापा का चेहरा बहुत बदल गया है. मेरी उनसे कभी कोई खास घनिष्ठता नहीं रही, वजह कुछ खास नहीं, शायद…

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