मैथिली कविता :: अनुराग मिश्र टोकन बैंक मे पाइ भेटबा सँ पहिने भेटैत छैक टोकन जकरा जेबी मे राखि, लोक परतारैत अछि मोन केँ एहि अजस्त्र हेंज मे छी हमहूँ एकटा प्रत्याशी ओहि टोकन केँ देखि-देखि मनुक्ख घोरैत अछि आशाक…
कविताएँ :: विष्णु पाठक जाड़े की रात दिन भर का थका किसान कंधे से बंदूक हटा लेट गया है खलिहान में और सुलगा रहा है सिगरेट. तीली की ‘चिस्सस’ … एक लंबी सांस और अंधेरे में खिल उठी लाल रोशनी. उसके…
कविताएँ :: सूरज सरस्वती प्रेमाक्षर कितनी ध्वनियां कण्ठ से निकलने से पूर्व ही विलुप्त हो गयीं कितने ही रस, छंद, अलंकार श्वेत पृष्ठ पर कलरव करते रहें न जाने कितने स्पर्श अंगुलियों की पोरों पर अनवरत नृत्य करते रहें कितना…
कहानी :: निशांत युद्ध का उद्घोष तीन महीने पहले कर दिया जा चुका था. सैनिकों को चिन्हित कर उन्हें किसी गुप्त स्थान पर ले जाकर प्रशिक्षित भी कर दिया जा चुका था. हथियारों की पहली खेप आने ही वाली थी….
कविता : सिमंतिनी घोष अनुवाद एवं प्रस्तुति : निखिल कुमार (सिमंतिनी, अशोका यूनिवर्सिटी, रोहतक में मनोविज्ञान की असिस्टेंट प्रोफेसर हैं. कविताओं के अलावा अकादमिक व सामाजिक विषयों पर काफी समय से लेखन कार्य कर रही हैं.) तुम दिखते हो आक्रोशित…
