कहानी :: उदासियों का बसंत : हृषिकेश सुलभ ज़िन्दगी सहल नहीं रह गई थी. वे बसते-बसते उजड़ गए थे. उनकी देह और उनके मन, दोनों का छन्द भंग हो रहा था…….और वे थे कि बार-बार भंग हो रहे छन्दों के…

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कविताएँ :: राजेश कमल प्रेम कबूतरों वाला ज़माना गया प्रेम फिर भी बचा रहा ज़माना तो संदेशियों वाला भी चला गया प्रेम फिर भी बचा रहा यहाँ तक कि चिट्ठियों वाला भी ज़माना गया प्रेम फिर भी बचा है. साइबर…

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गद्य : आदित्य शुक्ला (शाम के सात बजे आज साप्ताहिक प्रहसन सुनिए…) “जरा हटके, जरा बचके ये है बम्बे मेरी जां” *फ़िल्मी वह एक स्कैंडेलस शाम थी. सब लोग इस दुनिया में व्याप्त केओस से परेशान थे. लेकिन आखिरकार वे…

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फ़िल्म समीक्षा :: प्रभात प्रणीत देश, राष्ट्र, मुल्क की परिभाषा क्या होनी चाहिए इस बारे में कभी ज्यादा सोचा नहीं था, लेकिन जब भी जितना भी सोचा, इसकी किताबी परिभाषा से ज्यादा प्रभावित नहीं हो पाया. मुल्क फिल्म में आरती…

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लेख : उत्कर्ष कविताएँ लिखना अब आम बात है शायद और आज कल हमें इंटरनेट पर कोई न कोई रचना दिख ही जाएगी. पर कविता-लेखन की इस भीड़ में साहित्य की कसौटी पर खरा उतरने वाली रचना कौन सी है,…

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