गद्य : उत्कर्ष बंदीगृह के झरोखे से :: भाग :१ यहाँ कोई गौरैया नहीं दिखाई देती. यहाँ कोई कोयल भी नहीं. हालाँकि जिसने कभी गौरैया ना देखा हो, या कोयल की कूक भी ना सुनी हो, इस अनुभव के स्वाद…

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संपादकीय :: बालमुकुन्द गए कुछ वर्षों से कई साहित्यिक-सांस्कृतिक आयोजनों का प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से साक्षी बनता रहा हूँ। आम तौर पर ऐसे आयोजन भाषा, साहित्य, संस्कृति, इतिहास जैसे विभिन्न विषय केन्द्रित होते हैं लेकिन इन आयोजनों में गाहे-वगाहे एक प्रश्न,…

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अरुण कमल की कुछ काव्य-पंक्तियाँ :: चयन और प्रस्तुति : स्मृति चौधरी   अरुण कमल के काव्य-संसार से मेरा पहला परिचय तब हुआ था जब मैं स्कूल में थी। ‘नए इलाके में’ हमारी हिंदी पाठ्यक्रम का भाग हुआ करता था।…

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प्रधान सम्पादक की चिट्ठी :: प्यारे दोस्तों इंद्रधनुष की औपचारिक शुरुआत हुए आज एक वर्ष हो गया. पिछला एक साल कई तरह की चुनौतियों, अनुभवों और संतुष्टियों को देने वाला रहा. सबसे पहले तो संस्था के तौर पर, हमलोग नए…

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