भोजपुरी कहानी:: तुषार कान्त उपाध्याय ई गाड़ी कुल्हि कतना देर हो जईहन स कहल नईखे जा सकत…अब त कुहो के दिन खतम हो गईल…ऊहो सात घंटा देरी से…कमल झुझुवात अपना बगल के अनजान जातरी से बरबरात कहत रहले. गाँव से…

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प्रतिसंसार :: लेख : आदित्य शुक्ल मध्य वर्ग का दुःख बेहद ही अज़ीब किस्म का होता है. भोजपुरी में एक कहावत है: दो ही सुखी – कि त लक्खू, कि त भिक्खू (सिर्फ दो ही लोग सुखी हैं – या…

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मैथिली कविता:: हरेकृष्ण झा फार सँ छिटकत आब बेलीक फूल फार सँ छिटकैत अछि कनखा इजोतक, भक टूटि जाइत अछि. सोझाँ अबैत अछि अर्घासनक कोहा चर्बी सँ उमसाम, एकटा कुंजी चकरी मारने बीचोबीच. बामा हाथ रखैत छी हरीस पर हरबाहक…

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डायन : तुषार कान्त उपाध्याय उस दिन घर में कोहराम मचा था . धीरे – धीरे  , सुगबुगाहट  के लहजे में  . जैसे सुनामी के पहले की हवाएँ . मईया चिंतित खटिया पर बैठी माई को समझा रही थीं ….

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मैथिली कविता :: अनुराग मिश्र टोकन बैंक मे पाइ भेटबा सँ पहिने भेटैत छैक टोकन जकरा जेबी मे राखि, लोक परतारैत अछि मोन केँ एहि अजस्त्र हेंज मे छी हमहूँ एकटा प्रत्याशी ओहि टोकन केँ देखि-देखि मनुक्ख घोरैत अछि आशाक…

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