कविताएँ :: विष्णु पाठक जाड़े की रात दिन भर का थका किसान कंधे से बंदूक हटा लेट गया है खलिहान में और सुलगा रहा है सिगरेट. तीली की ‘चिस्सस’ … एक लंबी सांस और अंधेरे में खिल उठी लाल रोशनी. उसके…
कविताएँ :: सूरज सरस्वती प्रेमाक्षर कितनी ध्वनियां कण्ठ से निकलने से पूर्व ही विलुप्त हो गयीं कितने ही रस, छंद, अलंकार श्वेत पृष्ठ पर कलरव करते रहें न जाने कितने स्पर्श अंगुलियों की पोरों पर अनवरत नृत्य करते रहें कितना…
कहानी :: निशांत युद्ध का उद्घोष तीन महीने पहले कर दिया जा चुका था. सैनिकों को चिन्हित कर उन्हें किसी गुप्त स्थान पर ले जाकर प्रशिक्षित भी कर दिया जा चुका था. हथियारों की पहली खेप आने ही वाली थी….
कविता : सिमंतिनी घोष अनुवाद एवं प्रस्तुति : निखिल कुमार (सिमंतिनी, अशोका यूनिवर्सिटी, रोहतक में मनोविज्ञान की असिस्टेंट प्रोफेसर हैं. कविताओं के अलावा अकादमिक व सामाजिक विषयों पर काफी समय से लेखन कार्य कर रही हैं.) तुम दिखते हो आक्रोशित…
कहानी:: अप्रेम : अनिल यादव अपने भीतर नक्षत्रों को छिपाए होने का भ्रम पैदा करते कंप्यूटरों से झरते हल्के नीले प्रकाश और बीसियों जोड़ी आंखों में अनगिनत भावनाओं के रूप में परावर्तित उनकी आभा के बीच एक संक्षिप्त प्रेम कहानी…
