प्रतिसंसार :: आदित्य शुक्ल [प्रियंबदा प्रिय.] ______________ इमराना कहती थी कि सब एक न एक दिन बिछड़ जाते हैं. एक दिन मैं उसपर चिढ़ गया. वीरू तो बचपन का दोस्त है, सब बिछड़ जाएं वो न बिछड़ेगा. कुछ दिन पहले…
फ़िल्म समीक्षा:: सैयद एस. तौहीद फिल्मकार रॉबर्ट ब्रेसां को सिनेमा का संत कहा जाना चाहिये जिनकी कविताई अभिव्यक्ति ‘Au Hasard Balthazar‘ को मर्मस्पर्शी सिनेमा का ताज़ जाएगा. यह फिल्म गधे अथवा गर्दभ समान निरीह प्राणी के जीवन का भावपूर्ण डॉक्युमेंटेशन …
प्रतिसंसार :: आदित्य शुक्ल [प्रिय प्रिय प्रियम्बदा.] ___________________ मिलान कुंदेरा अपने उपन्यास ‘अनबियरेबल लाइटनेस ऑफ़ बीइंग’ की शुरुआत नीत्शे के शाश्वत वापसी सिद्धांत पर विमर्श करते हुआ करता है. हल्कापन और भार. नीत्शे के शाश्वत भार के मिथ को अगर…
कविताएँ :: मोहन कुमार झा सही-गलत अगर मैं गलत होता, तो अब तक जरुर ख़त्म हो गया होता. परन्तु मैं जीवित हूँ – ‘दूब-सा’ मिट्टी के किसी कण में अपनी जड़ टिकाए. मैं कायम हूँ – किसी पवित्र मंत्र-सा सदियों से…
प्रतिप्रश्न:: नवल जी की पाठशाला : संजय कुंदन नवल जी मतलब हिंदी के प्रख्यात आलोचक डॉ. नंदकिशोर नवल. 1987-88 में वे पटना के रानीघाट के सुमति पथ में रहते थे. उनका वह मकान मैं कभी नहीं भूल सकता क्योंकि वह…
