सुमित झा की कविताएँ : तुम्हारे शहर में 1. लौट कर आने के बाद चीजें वैसी नहीं मिलती पटना घूमते हुए पाया कि यहाँ की भागती दौड़ती सड़कों पर लोगों की भीड़ में मैं अब अकेला हूँ. मेरी हथेलियाँ ढूंढती…
सम्पादकीय : अंचित समय के गुज़रने, कुछ बीत जाने और कुछ नया आने, इतिहास की गति और यह कि कोई यात्रा चल रही है, कि हम कहीं जा रहे हैं— मानव विकास की यात्रा में यह भी कोई स्टेज है,…
न से नारी :: उद्धरण : ग्लोरिया स्टाइनम अनुवाद और प्रस्तुति : प्रिया प्रियादर्शिनी ग्लोरिया स्टाइनम एक अमेरिकी स्त्रीवादी पत्रकार और सामाजिक राजनीतिक कार्यकर्ता हैं. 1969 में, स्टाइनम ने ‘न्यूयॉर्क मैगजिन’ के अपने एक स्तम्भ में एक लेख प्रकाशित किया,…
कविताएँ :: देवेश पथ सारिया विद्रोही तगड़ा कवि था (रमाशंकर यादव विद्रोही के लिए) ओ आदिवासी, मेरे वनवासी ओ नर-वानर जेएनयू के बीहड़ में घूमते पेड़ों के नीचे सोते खांसते, बलगम थूकते थकती रही देह तुम्हारी तुम्हारे दम तोड़ने के…
डायरी :: तोषी पांडेय आज से ४ साल पहले मेरे थेरिपिस्ट ने यह घोषित कर दिया था की मुझे पी टी एस डी है. यानि पोस्टट्रामेटिक डिसऑर्डर. आज से चार साल पहले ये जानना और अब उसको पलट के देखना…
