कविता :: प्रशांत विप्लवी मंगलेश डबराल के प्रति उस रोज़ कृष्णा सोबती की अंत्येष्टि थी वे शायद वहीं से लौटकर आए थे एन एस डी के अहाते पर एम के रैना के साथ सिगरेट लिए वे हमारी तरफ बढ़ रहे थे…

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कविता :: कोंस्टेंटीन पी. कवाफ़ी अनुवाद और प्रस्तुति : अंचित बर्बरों का इंतज़ार  यहाँ बैठक में इस तरह जमा होकर हम लोग क्या कर रहे हैं? आज बर्बर आने वाले हैं. आज संसद में कुछ हो क्यों नहीं रहा? आज…

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कविताएँ :: आदित्य प्रकाश वर्मा  चाँद पर कविता कवि ने लिखी चाँद पर कितनी कविताएं, जब भी कवि और चाँद नजर मिलाते थे, पर अब, कविताएं नहीं है, उनकी नजर मिलती है, पर कविताएं नहीं हैं. चाँद ने भी, बादलों…

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कविताएँ :: योगेश ध्यानी जगह १. उस विशाल कमरे में कितनी कम जगह है जहाँ रहता है कुछ गुलदानों संग एक व्यक्ति सम्पूर्ण विलासिता के साथ. कितनी ज्यादा जगह है रेल के उस तृतीय श्रेणी कोच में जहां ठूँसे हुए…

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