कविता :: मरीना स्वेताएवा अनुवाद : अंचित माथे पर एक चुम्बन – दर्द मिटा देता है। मैं तुम्हारा माथा चूमती हूँ । आँखों पर एक चुम्बन – अनिद्रा भगाता है। मैं तुम्हारी आँखें चूमती हूँ। होंठों पर एक चुम्बन –…

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कविता :: प्रशांत विप्लवी मंगलेश डबराल के प्रति उस रोज़ कृष्णा सोबती की अंत्येष्टि थी वे शायद वहीं से लौटकर आए थे एन एस डी के अहाते पर एम के रैना के साथ सिगरेट लिए वे हमारी तरफ बढ़ रहे थे…

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कविता :: कोंस्टेंटीन पी. कवाफ़ी अनुवाद और प्रस्तुति : अंचित बर्बरों का इंतज़ार  यहाँ बैठक में इस तरह जमा होकर हम लोग क्या कर रहे हैं? आज बर्बर आने वाले हैं. आज संसद में कुछ हो क्यों नहीं रहा? आज…

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